जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या में राममंदिर निर्माण के लिए भूमिपूजन कर रहे थे, एक सेवानिवृत्त फौजी अपनी आंखों में खुशी के आंसू लिए घी के दिये जला रहे थे। इस फौजी ने पाकिस्तान के खिलाफ 1965-1971 की लड़ाइयां और चीन के खिलाफ 1962 की जंग लड़ी है। देश की मिट्टी का कर्ज उतारने के बाद इस फौजी ने रामनाम के आंदोलन में भी में अपनी जान को दांव पर लगा दिया था।
हालात ऐसे थे कि 22 दिन तक घरवालों को उनकी खबर ही नहीं थी कि वो इस दुनिया में हैं भी या नहीं। हम बात कर रहे हैं चार मरला कालोनी निवासी ईश्वरचंद मिड्डा की जिन्हें उनके जानने वाले प्यार से फौजी साहब कहते हैं। उन्हें साल 1965 में रक्षा मेडल और समाजसेवा स्टार अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है। सात साथियों के साथ पुलिस को छकाते हुए
अयोध्या पहुंचे थे।
शरीर के बिल्कुल पास से गुजरी थी गोलियां
चार मरला कालोनी निवासी ईश्वरचंद मिड्डा उर्फ फौजी साहब फतेहाबाद से हिसार-दिल्ली होते हुए पहले लखनऊ पहुंचे थे। इसके बाद वो अयोध्या के लिए रवाना हुए थे । मुलखराज चावला, मेहर चंद गांधी, गंगाधर मेहता, बंसल दंपती सहित कई लोग इस सफर में उनके साथ थे।
ईश्वरचंद मिड्डा की मानें तो उस समय पुलिस प्रशासन का पूरा जोर ही इस बात पर था कि कारसेवकों को अयोध्या ना पहुंचने दिया जाए। इस दौरान कई बार सांप्रदायिक तनाव भी फैला। एक-आध बार तो ऐसा भी हुआ कि गोलीबारी की नौबत आ गई और गोली शरीर के बिल्कुल पास से गुजर गई।