वर्ल्ड नो टोबैको डे के अवसर पर प्राइवेट हास्पिटल व पीजीआई ने जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए। फोर्टिस अस्पताल ने यूथ इनोवेटिव सोसायटी एनजीओ के साथ मिलकर सेक्टर-12 स्थित चंडीगढ़ कालेज ऑफ आर्किटेक्चर में जागरूकता सत्र आयोजित किया।
इस सत्र में 110 से ज्यादा विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया, जिसमें क्रिटिकल केयर एंड प्यूलमनोलॉजिस्ट, फोर्टिस अस्पताल, मोहाली के कंसल्टेंट डॉ. जफर अहमद इकबाल की परिचर्चा और फोर्टिस अस्पताल, मोहाली के नर्सिंग स्टाफ द्वारा खेली गई लघु नाटिका शामिल थी।
तंबाकू सेवन से होने वाले गंभीर नतीजों के बारे में डॉ. जफर अहमद इकबाल ने कहा, ‘तंबाकू का सेवन मौत के बड़े कारणों में से एक है, जिससे दुनियाभर में अनुमानत: पांच मिलियन सालाना दर से लोग मौत के मुंह में जाते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक तंबाकू, वर्ष 2030 तक हर साल 8 मिलियन लोगों की मौत का कारण बनने वाला है। उन्होंने बताया कि तंबाकू में 4000 से भी ज्यादा रसायन होते हैं, जिनमें से 10 फीसदी बेहद खतरनाक होते हैं। इनमें से सबसे घातक रसायनों में तार, निकोटिन और कार्बन मोनोऑक्साइड हैं।
अस्पताल के नर्सिंग स्टाफ ने इस परिचर्चा के बाद एक बेहद मनोरंजक लघु नाटिका प्रस्तुत की, जिसमें युवाओं पर तंबाकू सेवन के प्रभावों को दर्शाया गया। यह बेहद मनोरंजक प्रस्तुति रही। इसमें ‘तंबाकू छोड़ो, स्वस्थ जीवन बिताओ’ जैसा सशक्त सामाजिक संदेश दिया गया।
दो सौ एनसीसी कैडेट ने ली शपथ
विश्व तंबाकू निषेध दिवस के मौके पर मैक्स सुपर स्पेशिएलिटी हॉस्पिटल (एमएसएसएच), मोहाली ने पोस्ट ग्रेजुएट गर्वनमेंट कॉलेज (पीजीजीसी) सेक्टर-11, चंडीगढ़ में जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया। इसमें 200 से एनसीसी कैडेट्स ने हिस्सा लिया।
इस मौके पर पर कैडेट्स ने शपथ ली कि वे अपनी जिंदगी में कभी धूम्रपान नहीं करेंगे। इस मौके पर बिग्रेडियर जेएस अरोड़ा, जेएस जेजी, डॉ. जेएस रघु, डॉ. विनय कुमार, डॉ. सुनंदन शर्मा, डॉ. पंकज कुमार, डॉ. दीपक भसीन और डॉ. श्वेता गुप्ता भी उपस्थित रहे।
इस मौके पर मैक्स के सीनियर कंसलटेंट डॉ. सचिन गुप्ता ने बताया कि चंडीगढ़ 2007 से ही नो स्मोकिंग सिटी घोषित है, लेकिन शहर में फेफड़ों के कैंसर के मामलों को बढ़ते हुए पाया गया है। इनमें से अधिकांश वे लोग हैं जो कि लगातार धूम्रपान करते हैं ये लंबे समय से ऐसा कर रहे हैं। डॉ. गुप्ता ने चेताया कि धूम्रपान छोड़ने के 20 से 30 साल बाद भी फेफड़ों का कैंसर होने का जोखिम बना रहता है।