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आशुतोष महाराज मामला: 'सरकार के विचार का विषय नहीं, हमारा दायित्व लोगों की धार्मिक भावनाओं की रक्षा'

Tue, 09 May 2017 10:06 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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आशुतोष महाराज - फोटो : file photo
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पंजाब के एजी अतुल नंदा ने सोमवार को दिव्य ज्योति जागृति संस्थान नूरमहल जालंधर के संस्थापक आशुतोष महाराज मामले में यह स्पष्ट कर दिया कि महाराज समाधि में हैं या मृत, यह तय करना सरकार का काम नहीं है। उन्होंने कहा कि इस विषय पर सरकार बिल्कुल तटस्थ है। यह आस्था व विश्वाश का विषय है। सरकार का काम सभी की धार्मिक भावनाओं की सुरक्षा करना है।
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आशुतोष महाराज के शरीर की स्थिति से यह पूरा विवाद जुड़ा है। 2014 में उन्हें समाधि की स्थिति में करार देते हुए उनके शरीर को डीप फ्रिजर में रख दिया गया था। इसके बाद उनके समर्थकों का दावा था कि वे इस शरीर में पुन: प्रवेश करेंगे, ऐसे में उनके शरीर को संरक्षित करना जरूरी है। इसके बाद से ही यह मामला पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में लंबित है।

कभी महाराज के अपहरण का आरोप लगाया गया तो कभी उनकी हत्या की बात कहते हुए याचिकाएं दाखिल की गईं। आखिरकार एक कथित पुत्र सामने आया, जिसने आशुतोष महाराज को पिता बता उनके शव का अंतिम संस्कार अपना हक बताते हुए शव सौंपने की अपील की। 
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इस मामले में सिंगल बेंच ने फैसला सुनाते हुए आशुतोष महाराज का अंतिम संस्कार करने की जिम्मेदारी पंजाब सरकार को सौंप दी थी। इस फैसले को संस्थान, कथित पुत्र, महाराज समर्थकों और पंजाब सरकार ने डिवीजन बेंच के सामने चुनौती दी है। पंजाब सरकार को छोड़कर सभी अपना पक्ष रख चुके हैं और पंजाब सरकार की दलीलें भी अंतिम दौर में हैं। 
 
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शरीर के निपटारे की याचिका में नहीं थी अपील: एजी

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट
सोमवार को पंजाब सरकार की ओर से दलील आरंभ करते हुए एजी ने कहा कि सिंगल जज ने महाराज के शरीर के अंतिम संस्कार के लिए एक कमेटी गठित करने का फैसला सुनाया था, जबकि ऐसी कोई मांग ही नहीं की गई थी। सिंगल बेंच के समक्ष दो याचिकाएं दायर की गई थीं। एक महाराज के पूर्व ड्राइवर पूरन सिंह ने दायर की थी और दूसरी याचिका महाराज के कथित पुत्र ने दायर की थी।

सिंगल बेंच ने दोनों ही याचिकाएं खारिज कर दी थीं। इसके बाद इस मामले में संस्थान ही एक पक्ष रह गया था, जिसकी मान्यता थी कि महाराज समाधि में हैं। इस पक्ष को नजरअंदाज कर महाराज के शरीर के अंतिम संस्कार के आदेश दे दिए गए। इसके लिए एक कमेटी के गठन के भी आदेश दे दिए गए थे। अतुल नंदा ने कहा कि राज्य के काम किसी की धार्मिक मान्यताओं में दखल देना नहीं है। 

अतुल नंदा ने कहा कि सिंगल बेंच ने यह आदेश इस तथ्य को ध्यान में रख कर दिया था कि महाराज के शरीर की पूरी गरिमा बरकरार रहे, जबकि महाराज के शरीर को पूरी गरिमा और श्रद्धा के साथ संरक्षित किया हुआ है। सोमवार को लगातार चली सुनवाई के बाद अब हाईकोर्ट ने सुनवाई को मंगलवार को फिर से आरंभ करने का फैसला लिया है।
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