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रॉबर्ट वाड्रा-हुड्डा पर एफआईआर के बाद अशोक खेमका ने ट्वीट कर निकाला गुबार, 5 क्लिक में पूरा मामला

Mon, 03 Sep 2018 05:59 PM IST
ब्यूरो डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
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रॉबर्ट वाड्रा, अशोक खेमका और मनोहर लाल खट्टर - फोटो : फाइल फोटो
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हरियाणा के चर्चित आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा व उद्योगपति रॉबर्ट वाड्रा पर खेड़की दौला थाने में एफआईआर दर्ज होने के बाद अपने मन का गुबार निकाला है। खेमका ने ट्वीट करते हुए जहां वाड्रा-डीएलएफ लैंड डील की जांच के लिए ढींगरा आयोग के गठन पर सवाल खड़े किए हैं, वहीं वर्तमान भाजपा सरकार पर भी निशाना साधा है।
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खेमका ने ट्वीट कर कहा है कि ढींगरा जांच आयोग का गठन जनता के पैसे और समय की बर्बादी था। जो एक व्यक्ति ने अब किया, वह सरकार तीन साल पहले भी कर सकती थी। सरकार को सरकारी दस्तावेजों और उनकी जमीन खरीद सौदे को लेकर तैयार 21 मई 2013 व 12 फरवरी 2015 की रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई करनी चाहिए थी। भ्रष्टाचारियों को बचाना भी भ्रष्टाचार करने जैसा ही है।

2013 में वाड्रा-डीएलएफ लैंड डील के नाम से उजागर मामले में पहली एफआईआर निजी व्यक्ति ने पांच साल बाद करवाई है। इसका भी खेमका को मलाल है। चूंकि, 2013 में खेमका ने ही इस मामले का खुलासा करते हुए भूमि सौदे का इंतकाल रद कर दिया था। मई 2015 में सरकार ने इस मामले की जांच के लिए ढींगरा आयोग का गठन किया था। आयोग अपनी रिपोर्ट अगस्त 2016 में सौंप चुका है, जिसे सार्वजनिक करने पर हाईकोर्ट ने रोक लगाई हुई है।
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खेमका के मन में इस बात की भी टीस है कि उनकी दो जांच रिपोर्ट में वाड्रा-डीएलएफ लैंड डील में हुए घोटाले में संलिप्त लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त तथ्य थे, लेकिन सरकार ने उनके आधार पर कार्रवाई नहीं की। बता दें कि पूर्व हुड्डा सरकार के समय ही अशोक खेमका ने इस भूमि सौदे का इंतकाल रद कर दिया था। जिससे वह सरकार के निशाने पर भी रहे। सरकार ने उन्हें एक अन्य मामले में चार्जशीट भी थमाई। हुड्डा सरकार के साथ उनका छत्तीस का आंकड़ा काफी सुर्खियों में रहा।

अशोक खेमका ने अपनी रिपोर्ट में सबसे पहले उठाए थे सवाल

आईएएस अशोक खेमका और रॉबर्ट वाड्रा
राबर्ट वाड्रा ने शिकोहपुर गांव में जमीन खरीदने का सौदा 8 फरवरी, 2008 में किया तब उसकी कंपनी की पेडअप कैपिटल मात्र एक लाख रुपये थी। वाड्रा ने कॉरपोरेशन बैंक का जाली चेक लगाकर जमीन की रजिस्ट्री करा ली। जमीन का मूल्य 7.5 करोड़ रुपये दिखाया और रजिस्ट्री पर खर्चा आया 45 लाख रुपये।

जमीन खरीदने के 18 दिन के भीतर हरियाणा सरकार के टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग ने लैंड यूज बदलकर इस जमीन पर कॉलोनी बनाने का लाइसेंस जारी कर दिया। छह महीने बाद वाड्रा ने यह जमीन 58 करोड़ रुपये में डीएलएफ को बेच दी। डीएलएफ से जो अग्रिम पैसा मिला वाड्रा ने उसी से जमीन का मूल्य चुकाया।

मतलब यह है कि बिना धेला खर्च किए वाड्रा ने सिर्फ छह महीने में 50 करोड़ रुपये से ज्यादा कमा लिए।  पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की बजाय तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने वाड्रा का बचाव किया था। तब इस मुद्दे पर संसद की कार्यवाही भी ठप हुई, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

चुनावी राजनीति से प्रेरित है एफआईआर : वाड्रा

Robert Vadra
चुनावी सीजन, तेल के दामों में बढ़ोतरी। ऐसे में चलो एक दशक पुराने मामले के जरिए ही असली मुद्दों से जनता का ध्यान हटाया जाए। इसमें नया क्या है।
- रॉबर्ट वाड्रा

सरकार ने कोई गलत नहीं किया, कानून पर पूरा विश्वास : हुड्डा
पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा का कहना है कि उनकी सरकार ने कुछ गलत नहीं किया। उन्हें कानून पर पूरा विश्वास है। भाजपा सरकार ने अपनी विफलताओं से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए एफआईआर दर्ज करवाई है। एफआईआर राजनीति से प्रेरित है। चार साल में सरकार को कुछ नहीं मिला, इसलिए अब यह हथकंडा अपनाया। ढींगरा आयोग की रिपोर्ट भी इसी मुद्दे पर आई थी। वे जहां जाते हैं हुजूम उमड़ पड़ता है। जबकि भाजपा के साथ कोई नहीं, इसलिए हताश होकर ऐसे कदम उठा रहे हैं।

यह कदम राजनीति से प्रेरित है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव नजदीक होने के चलते कांग्रेस की छवि खराब करने, राफेल सौदे में किए घोटाले से जनता का ध्यान हटाने के लिए भाजपा ने एफआईआर दर्ज कराई है।
- अशोक तंवर, प्रदेश अध्यक्ष, प्रदेश कांग्रेस कमेटी

वाड्रा और पूर्व सीएम हुड्डा पर एफआईआर

ROBERT VADRA
दस साल पुराने भूमि घोटाले के मामले में सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के खिलाफ शनिवार को एफआईआर दर्ज की गई। नियमों को ताक पर रखकर गुरुग्राम जिले में जमीन आवंटन करने व कॉलोनी विकसित करने के लिए लाइसेंस देने के इस मामले में खेड़कीदौला थाना पुलिस ने डीएलएफ व मैसर्स ओंकेश्वर प्रॉपर्टीज के खिलाफ भी मामला दर्ज किया है।

हुड्डा और वाड्रा के खिलाफ भू््मि घोटाले में यह पहला मामला बताया जा रहा है। पुलिस के अनुसार वर्ष 2008 के इस प्रकरण में गांव राठीवास तावडू निवासी सुरेंद्र सिंह की शनिवार को दी गई शिकायत पर तत्काल केस दर्ज कर लिया। शिकायत में कहा गया है कि वर्ष 2007 में स्काई लाइट हॉस्पिटेलिटी कंपनी रजिस्टर्ड हुई थी, जिसकी कुल पूंजी एक लाख रुपये थी। इस कंपनी के निदेशक रॉबर्ट वाड्रा थे।

वर्ष 2008 में ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज से स्काई लाइट हॉस्पिटेलिटी ने गांव शिकोहपुर के सेक्टर-83 में 3.5 एकड़ जमीन खरीदी थी। इसके लिए चेक से 7.5 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था। आरोप है कि यह जमीन बोगस चेक के जरिए खरीदी गई थी। इस जमीन को खरीदने के बाद वाड्रा ने अपने वर्चस्व का प्रभाव दिखाते हुए कमर्शियल कॉलोनी विकसित करने के लिए टाउन एवं कंट्री प्लानिंग से लाइसेंस लिया था।

यह विभाग पूर्व मुख्यमंत्री हुड्डा के अधीन था। लाइसेंस मिलने के बाद वाड्रा ने यह जमीन 58 करोड़ रुपये में डीएलएफ को बेच दी। आरोप है कि जमीन बेचने के बाद नियमों को ताक पर रखते हुए गांव वजीराबाद की 5 हजार करोड़ रुपये की 350 एकड़ जमीन भी डीएलएफ को आवंटित कर दी गई। मालूम हो कि इससे पहले वर्ष 2008 में भी शिकायत की गई थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

इन आरोपों में एफआईआर
वाड्रा और हुड्डा पर आईपीसी की धारा 420 (धोखाधड़ी), 120 बी (आपराधिक साजिश), 467 (जालसाजी), 468 (धोखाधड़ी के लिए जालसाजी) 471 (फर्जी दस्तावेज का असली के तौर पर इस्तेमाल),  भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम की धारा 13 के तहत मामला दर्ज किया गया है।

रद्द हुआ था इंतकाल

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जमीन आवंटन के बाद उसका इंतकाल भी दर्ज कर दिया गया था। स्काई लाइट हॉस्पिटेलिटी को जमीन आवंटन करने व नियमों को ताक पर रखकर लाइसेंस जारी करने का घोटाला उजागर होने पर तत्कालीन डॉयरेक्टर जनरल ऑफ लैंड रिकॉर्ड कॉन्सोलोडेशन ने इंतकाल रद्द कर दिया था। आरोप है कि इस पर हुड्डा ने गैर कानूनी तरीके से 3 सदस्यीय कमेटी गठित की और इंतकाल रद्द करने के आदेश को ही निरस्त कर दिया।

यह प्रकरण वर्ष 2008 का है। शनिवार को शिकायत मिलते ही केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है।
- राजेश सिंह, पुलिस उपायुक्त, मानेसर

बैंक खाते में जमा नहीं हुआ था 7.5 करोड़ का चेक
शिकोहपुर में जमीन खरीदने के लिए स्काई लाइट ने 7.5 करोड़ रुपये का चेक ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज को दिया था। इस चेक का जिक्र जमीन रजिस्ट्री में भी किया गया। जांच में पता चला कि चेक कभी बैंक में जमा नहीं हुआ। यह महज दिखावे के लिए था। वर्ष 2008 में पुलिस को शिकायत देने के बाद जांच धीमी गति से की गई। गड़बड़ी उजागर होने के बाद भी अधिकारियों को तय करने में करीब 10 वर्ष लग गए कि यह घोटाला हुआ है।

गलत तरीके से 350 एकड़ जमीन डीएलएफ को बेची

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पूरे मामले में वजीराबाद मे एचएसआईआईडीसी की 350 एकड़ जमीन घोटाला भी सामने आया था, जिसमें तत्कालीन हुड्डा सरकार ने गलत तरीके से यह जमीन  डीएलएफ को आवंटित कर दी थी। जानकारी के मुताबिक अरबों रुपए की 350 एकड़ जमीन के लिए सरकार की ओर से औपचारिक तौर पर बोली प्रक्रिया की गई थी, जिसमें डीएलएफ के अलावा एक अन्य रियल इस्टेट कंपनी ने हिस्सा लिया था।

हालांकि बाद में तकनीकी तौर पर खामियां निकालते हुए दूसरी कंपनी को बोली से बाहर करते हुए डीएलएफ को सीधे तौर पर 350 एकड़ जमीन आवंटित कर दी गई थी। इतना ही नहीं कॉलोनी विकसित करने के लिए जो लाइसेंस स्काइलाइट हॉस्पिटेलिटी को दिया गया था उसमें कई खामियां भी उजागर हुई थी, जिसका इंतकाल होने के बाद चकबंदी विभाग ने रद्द कर दिया था।

अघोषित तौर पर डीएलएफ की सहायक कंपनी थी ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज
शिकोहपुर जमीन घोटाले में जिस ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज से लेनदेन के नाम पर फर्जीवाड़ा हुआ था। वह अघोषित तौर पर डीएलएफ की सहायक कंपनी ही थी। जिसके नाम पर शिकोहपुर के दो किसान भाइयों से करीब 27 लाख रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से पूरी जमीन एक करोड़ रुपए में खरीद ली थी।

हालांकि इस पूरे प्रकरण में डीएलएफ ने ही पर्दे के पीछे से मुख्य भूमिका निभाते हुए औने पौने दामों पर खरीदी गई जमीन को रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी स्काई लाइट हॉस्पिटेलिटी को 7.50 करोड़ में बेच दी थी। पूरे प्रकरण में डीएलएफ के खेल की शुरुआत ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज के रूप में की गई थी।

 
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परेशानी में आ सकती है कांग्रेस

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शिकोहपुर गांव की जमीन के घोटाले को लेकर रॉबर्ट वाड्रा और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के खिलाफ मामला दर्ज होने के बाद भूमि सौदा एक बार फिर कांग्रेस पार्टी के लिए परेशानी का सबब बनता दिख रहा है। तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह के शासनकाल में हरियाणा कैडर के आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने वाड्रा द्वारा शिकोहपुर गांव में जमीन खरीदने और कुछ समय बाद ही उसे करोड़ों रुपये के मुनाफे पर बेचने के मामले में रिपोर्ट देकर नेहरू-गांधी परिवार की प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगा दिया था।

खेमका की रिपोर्ट से वाड्रा ही नहीं हरियाणा सरकार द्वारा किए जमीन घोटालों का भी पता चला था। खेमका ने अपनी सौ पेज की रिपोर्ट में वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटेलिटी द्वारा 3.5 एकड़ जमीन खरीद सौदे को तार-तार कर दिया था। जांच के दौरान सामने आया था कि स्काई लाइट हॉस्पिटेलिटी ने जमीन बेचने के लिए डीएलएफ से 58 करोड़ रुपये अपने अकाउंट में ट्रांसफर तो करवाए गए, लेकिन जमीन की रजिस्ट्री के लिए दी जाने वाली स्टाम्प ड्यूटी न तो जमीन खरीदते वक्त दी गई और न ही जमीन बेचते वक्त कहीं दिखाई गई है।

सूत्रों की मानें तो यह जमीन डीएलएफ को वजीराबाद की 350 एकड़ जमीन अलॉट करने की रिश्वत थी। उधर, अधिकारियों द्वारा नियमों को ताक पर रखकर कॉलोनी विकसित करने का लाइसेंस देने का भी मामला उजागर हुआ। आखिर जिस कंपनी की पूंजी ही 1 लाख रुपये है उसके पास 3.5 एकड़ जमीन खरीदने के लिए 7.50 करोड़ रुपये कहां से आए।

ढींगरा आयोग की जांच रिपोर्ट अब भी सार्वजनिक नहीं हुई
गुरुग्राम में कथित जमीन घोटाले के मामले में भाजपा सरकार ने एसएन ढींगरा की अध्यक्षता में आयोग का गठन किया था। आयोग ने ही शिकोहपुर जमीन घोटाले की जांच की थी। आयोग ने 182 पेज की रिपोर्ट हरियाणा सरकार को सौंप दी है, लेकिन अब तक यह रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई है।
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