ड्रैग फ्लिकर बनना चुनौती का काम
हॉकी में नार्मल पुश करना आसान है लेकिन ड्रैग फ्लिकर बनना बहुत चुनौतीपूर्ण है क्योंकि इसके लिए अलग तकनीक होती है। 2007 से 2010 तक लगातार तीन साल ड्रैग फ्लिकर बनने के लिए अभ्यास किया। आज भी भारतीय हॉकी टीम के रूपिंदर पाल सिंह से ट्रेनिंग लेती हूं जिन्हें ड्रैग फ्लिकिंग में महारत हासिल है। वे चंडीगढ़ में रहते हैं, उनसे दो सत्र में प्रशिक्षण ले लिया है लेकिन अभी और सुधार के लिए उनसे और प्रशिक्षण लेना है।
जमीनी स्तर पर खिलाड़ी निकालने के लिए हो काम
प्रदेश सरकार ने खिलाड़ियों को उनकी खेल के हिसाब से जो नौकरी देने का फैसला किया है, वह सराहनीय है। इससे प्रदेश के हजारों खिलाड़ियों के मन में आस जागी है क्योंकि खेल के बाद अगर खिलाड़ी को परिवार पालने के लिए नौकरी मिल जाए तो वह देश के लिए और बेहतर खेल सकता है। वहीं सरकार को पढ़ने वाले बच्चों को भी नौकरी देने की योजना बनानी चाहिए। खिलाड़ियों को टूर्नामेंट, हॉस्टल, ग्राउंड, कोच की सुविधा देने चाहिए। ऐसा करने से और खिलाड़ी निकलेंगे। गांवों में छोटे स्तर पर टूर्नामेंट नहीं हो रहे हैं। ऐसे टूर्नामेंट कराने से नया टैलेंट उभरकर सामने आएगा।
बच्चों को दी नसीहत
कार्यक्रम के दौरान अभिभावकों से अपील की है कि वे बच्चों को सिर्फ पढ़ाई करने के लिए दबाव न डाले बल्कि बच्चों की रुचि के अनुसार उन्हें खेलों में डालें। ऐसा करने से उनका विकास होगा। वहीं बच्चों को भी चाहिए कि वे देर रात तक मोबाइल देखने के बजाय जल्दी सो कर सुबह मैदान में जाकर पसीना बहाएं।