कहते है शौक बड़ी चीज है, ऐसी ही मिसाल पेश की है बिजनेसमैन से भजन गायक बने विनोद अग्रवाल ने, जिन्होंने अमर उजाला से खास बातचीत में बहुत कुछ बताया। विनोद ने 1978 से गायकी शुरू की। संगीत तो सीखा भी नहीं। 53 साल के विनोद अग्रवाल कहते हैं कि संगीत विशाल समुद्र है। परिवर्तन सृष्टि का नियम है। पाश्चात्य संगीत तो उत्तेजना भरता है। संगीत में शब्दों की प्रगाढ़ता भी जरूरी है। संगीत के नाम पर शोर हो रहा है। शब्दों का सही इस्तेमाल नहीं हो रहा है। शब्दों का सही इस्तेमाल होना चाहिए।
भजन गायक विनोद अग्रवाल सेक्टर-29 में एक शाम श्री राधामाधव के नाम कार्यक्रम में भजन पेश करने आए थे। इसी क्रम में उन्होंने अमर उजाला से खास बात की। विनोद अग्रवाल बताते हैं कि वे कपड़े के व्यापारी थे। अब मुंबई से बाइंड अप कर पत्नी के साथ वृंदावन आ गए। उन्होंने बताया कि हर प्रकार का सुख भोग लिया। मेरी पहले से ही इच्छा थी कि जिंदगी का एक चौथाई हिस्सा वृंदावन में गुजरे और प्राण भी वहीं पर जाए। उन्होंने कहा कि वे कोई उपदेशक या वक्ता और सुधारक नहीं है। साधारण गृहस्थ हैं। बेटे का अपना कारोबार है।
मुझे तो बदलेव ने मुंबई से निकाला..
विनोद अग्रवाल का कहना कि मुंबई में अपने बिजनेस स्थल पर हर रविवार को कीर्तन करते थे। दिल्ली से बलदेव मुंबई ट्रांसफर होकर आए थे। वे प्राइवेट कंपनी में जॉब करते थे। 1993 में मुलाकात हुई और हम दोनों साथ साथ भजन गाते हैं। अब तक तीन हजार से भी अधिक कार्यक्रम पेश कर चुके हैं। देश के करीब सभी भागों में भजन गाए और विदेशों में भी धूम मचाई।
भजन पेश करते हुए आखों में आंसू क्यों आते हैं इस पर विनोद अग्रवाल का कहना था कि यह तो भाव की बात है। जब दिल में नहीं समाते तो आंखों में आते हैं। विनोद अग्रवाल कहते हैं कि वृंदावन के संतों द्वारा रचित गीत ही वे गाते हैं। हां वे गीत जो अब तक किसी ने नहीं गया हो। भजनों में शायरी पढ़ता हूं। सूफी संगीत काफी शुकून देता है। उर्दू की शायरी भी भजनों के दौरान करते हैं। उनका कहना है कि सूफी तो विशालता है। संकीर्णता और कट्टरता नहीं है।
फ्रंटियर मेल से मुंबई जा रहे थे..
बात 1993 की है। भजन गायक विनोद अग्रवाल अमृतसर से फ्रंटियर मेल से मुंबई जा रहे थे। जगाधरी में डेढ़ सौ से भी अधिक लोग विनोद अग्रवाल से मिलने आ गए। ट्रेन से वहीं उतार लिया। जगाधरी में श्याम स्नेही संकीर्तन मंडल का हर रविवार को कीर्तन होता है। वहीं पर ले गए। बलदेव कृष्ण ने कहा कि वे दिल्ली में प्राइवेट कंपनी में जॉब करते थे। उनका ट्रांसफर मुंबई कर दिया गया। वहां पर संकीर्तन का साधन नहीं था। अपने बॉस को बोले कि मुझे दिल्ली बुला लो। बॉस ने कहा सभी तो मुंबई जाते हैं आप वहां से क्यों आना चाहते हैं।
फिर वे अपने दोस्तों और अन्य लोगों से पता किया कि मुंबई में विनोद अग्रवाल बिजनेसमैन हैं और वे हर रविवार अपने गद्दी पर संकीर्तन करते हैं। फिर पता कर वहां गया। फिर क्या था। ऐसी मिलनी हुई कि पता आज तक नहीं चला। यह बात जून 1988 की है। बलदेव कृष्ण बताते हैं कि 1993 में विनोद को मुंबई से निकाला। उसके बाद अब तक सफर के साथी हैं। पहली बार विनोद के साथ जगाधरी में गाया। उनका कहना है कि एक वर्ष में 150 कार्यक्रम होते हैं। ढाई सौ से अधिक एलबम हैं।