-रक्षा विशेषज्ञ कैप्टन राजिंदर सिंह लिट्ट बोले- यह लोकतंत्र, ड्रग्स या आतंकवाद का नहीं, बल्कि पेट्रोडॉलर और अमेरिकी वर्चस्व के अस्तित्व का सवाल
कंवरपाल
हलवारा। 3 जनवरी की तारीख अमेरिका की विदेश नीति में एक प्रतीक बनती जा रही है। 3 जनवरी 1990 को पनामा पर हमला कर जनरल मैनुअल नोरीगा को पकड़कर अमेरिका ले जाया गया था। ठीक 25 साल बाद उसी तारीख को वेनेजुएला में सैन्य कार्रवाई कर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में लिए जाने की घटना को केवल संयोग नहीं माना जा रहा। रक्षा मामलों के विशेषज्ञ और भारतीय सेना के रिटायर्ड कैप्टन राजिंदर सिंह लिट्ट का कहना है कि यह पूरी दुनिया, खासकर ब्रिक्स देशों के लिए एक खुला संदेश है- अमेरिकी डॉलर को चुनौती देने की कीमत चुकानी पड़ सकती है।
कैप्टन लिट्ट ने विशेष बातचीत में कहा कि पनामा और वेनेजुएला दोनों ही मामलों में असली मुद्दा लोकतंत्र, मादक पदार्थ या मानवाधिकार नहीं था। मूल संघर्ष रणनीतिक संसाधनों, वैश्विक वित्तीय व्यवस्था और भू-राजनीतिक नियंत्रण को लेकर है। ताजा घटनाक्रम के बाद अमेरिकी तेल कंपनियों के वेनेजुएला में दोबारा प्रवेश की तैयारियों ने इस आशंका को और गहरा किया है।
1974 में तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने सऊदी अरब के साथ एक ऐतिहासिक समझौता कराया। इसके तहत सऊदी अरब ने अपने तेल निर्यात का मूल्य निर्धारण केवल अमेरिकी डॉलर में करना स्वीकार किया और बदले में अमेरिका ने सैन्य सुरक्षा व राजनीतिक समर्थन की गारंटी दी। बाद में ओपेक के अन्य देशों ने भी यही मॉडल अपनाया। यहीं से पेट्रोडॉलर प्रणाली का जन्म हुआ, जिसने लगभग पांच दशकों तक अमेरिकी वर्चस्व को मजबूती दी। कैप्टन लिट्ट के अनुसार वेनेजुएला पर कार्रवाई शक्ति का नहीं, बल्कि भय का प्रदर्शन है- यह भय कि डॉलर अब अपने दम पर प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रहा और दुनिया के पास विकल्प उभर रहे हैं।
वेनेजुएला क्यों अहम है
वेनेजुएला के पास करीब 303 अरब बैरल सिद्ध तेल भंडार है, जो दुनिया में सबसे अधिक है और वैश्विक भंडार का लगभग 20 प्रतिशत माना जाता है। 2018 में वेनेजुएला ने खुले तौर पर अमेरिकी डॉलर से दूरी बनाने की घोषणा की। उसने तेल व्यापार में युआन, यूरो, रूबल समेत गैर-डॉलर मुद्राएं स्वीकार करनी शुरू कीं। साथ ही ब्रिक्स की सदस्यता की कोशिशें और चीन के साथ वैकल्पिक भुगतान प्रणाली पर काम भी तेज हुआ। दशकों तक चल सकने वाले तेल भंडार के साथ वेनेजुएला डॉलर-विरोधी रणनीति का मजबूत केंद्र बन सकता था। यही कारण है कि अमेरिकी नेतृत्व, खासकर पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में, मादुरो सरकार से टकराव बढ़ता गया।
इराक और लीबिया से मिलता-जुलता पैटर्न
2000 में इराक ने डॉलर के बजाय यूरो में तेल बेचने की घोषणा की। तीन साल बाद इराक पर हमला हुआ और सत्ता परिवर्तन के बाद तेल व्यापार फिर डॉलर में लौट आया। 2009 में लीबिया के नेता मुअम्मर गद्दाफी ने स्वर्ण-समर्थित अफ्रीकी मुद्रा का प्रस्ताव रखा। 2011 में नाटो की बमबारी हुई और गद्दाफी की हत्या कर दी गई। कैप्टन लिट्ट कहते हैं कि हर बार डॉलर को चुनौती के बाद सत्ता परिवर्तन और विनाश देखने को मिला। वेनेजुएला अकेला नहीं था। उसने चीन, रूस और ईरान के साथ रणनीतिक साझेदारी बनाई- ये तीनों देश वैश्विक स्तर पर डॉलर पर निर्भरता घटाने की दिशा में सक्रिय हैं। यही गठजोड़ अमेरिका के लिए सबसे बड़ा खतरा बना।