दूसरी ओर, भाकियू एकता उगराहां के प्रमुख सुखदेव सिंह से जब इस बारे में प्रतिक्रिया ली गई तो उन्होंने केजरीवाल और राजेवाल के बीच वार्ता पर कुछ भी साफ न कहते हुए केवल यही कहा कि किसान नेता राजनीति में शामिल होने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि राजेवाल भी काफी पहले साफ कर चुके हैं कि वह राजनीति में नहीं आएंगे।
वहीं, किसान नेता रुलदा सिंह का कहना है कि राजनीति किसानों के बस की नहीं है। किसानों ने तो कभी सरपंच पद का चुनाव नहीं लड़ा, वह विधानसभा चुनाव कहां लड़ सकेंगे? वहीं, किसान नेता दर्शन पाल भी पहले से किसानों के राजनीति में जाने का विरोध करते रहे हैं।
वहीं हरियाणा के प्रमुख किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी के विचार कुछ अलग हैं। गुरुवार को उन्होंने कहा कि पंजाब की राजनीति में किसानों को कदम रखना चाहिए और अब यह जरूरी भी हो चुका है। दूसरी ओर, राजेवाल ने इस संबंध में जब पूछा गया तो वे इस सवाल को टाल गए।
आप प्रमुख केजरीवाल अगर आंदोलनकारी किसानों को साथ लेकर बलबीर राजेवाल को मुख्यमंत्री के रूप में सामने लाने में सफल हो गए तो पंजाब का सियासी चेहरा पूरी तरह बदलना तय माना जा रहा है। सूबे की राजनीति की धूरी अब तक बादल परिवार (अकाली दल) और कैप्टन अमरिंदर सिंह (कांग्रेस) के बीच ही घूमती रही है। अन्य कोई भी सियासी दल अपने बलबूते प्रदेश की राजनीति में सर्वेसर्वा नहीं बन सका है। वहीं, राज्य में मौजूदा किसान आंदोलन केवल आंदोलन ही नहीं बल्कि एक लहर का रूप ले चुका है। अगर कोई पार्टी आंदोलनकारी किसान नेताओं को सीधे तौर पर चुनाव में उतारने में सफल हुई तो उन्हें आंदोलन की लहर का फायदा मिलना तय है।
भाजपा को बचाव का मिलेगा मौका
किसान आंदोलन के चलते पंजाब में भाजपा के खिलाफ बना माहौल जगजाहिर हो चुका है। हालांकि पार्टी अपने दम पर सभी 117 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान कर चुकी है, लेकिन आप की तरफ से अगर किसान नेताओं को चुनाव में उतारा गया तो भाजपा को अपने बचाव में यह कहने का मौका अवश्य मिल जाएगा कि किसान नेता सियासी फायदे के लिए आंदोलन चला रहे थे। कमोबेश यही चिंता संयुक्त किसान मोर्चे के सदस्य नेताओं की भी है और इसी कारण से किसान आंदोलन के किसी भी मंच पर किसी भी राजनीतिक दल के नेता को स्थान नहीं दिया जा रहा।