रिपोर्ट में इतना असमंजस होने के बाद चंद्रमोहन ने सोमवार को तीसरी निजी लैब में जांच के लिए अपना नमूना दिया। चंद्रकांत ने बताया इस पूरी प्रक्रिया में उन्हें और उनके परिवार को काफी परेशानी झेलनी पड़ी। निगम की टीम दवा के छिड़काव के लिए घर में आ गई।
स्वास्थ्य विभाग की टीम ने भी ढेर सारी दवाएं दे दीं और एकांतवास में जाने के लिए कह दिया। आसपास के लोगों में भी हड़कंप मच गया। इस पूरे घटनाक्रम को देखने के बाद ही समझ आता है कि लोग क्यों कोरोना को जांच कराने से बच रहे हैं। चंद्रमोहन ने आरोप लगाया है कि निजी लैब संचालक बिना देखे ही लोगों की रिपोर्ट को पॉजिटिव व निगेटिव बता देते हैं।
इससे पहले भी आ चुके हैं ऐसे मामले
इससे पहले बीते साल सितंबर माह में सेक्टर-27 के एक व्यक्ति ने सेक्टर-10 स्थित दो निजी लैबों में अलग-अलग टेस्ट कराया था। एक लैब की रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव आई तो दूसरे लैब की रिपोर्ट निगेटिव आई। वहीं इसी माह में एक गर्भवती महिला की रिपोर्ट भी अलग-अलग आने पर सवाल खड़े हुए थे। कांग्रेस पार्षद देवेंद्र सिंह बबला ने निजी लैबों की मनमानी पर रोक लगाने को कहा था।
हमारे पास सिर्फ एक ही रिपोर्ट दिख रही
इस संबंध में जब निजी लैब अतुल्य हेल्थ केयर में बात की गई तो बताया गया कि उनके पास एक ही रिपोर्ट दिख रही है, इसलिए दूसरी रिपोर्ट के बारे में वह कुछ नहीं कह सकते। साथ ही कहा गया कि अधिक जानकारी के लिए ऑफिस में संपर्क कर लें।
कोरोना की जांच रिपोर्ट का अलग-अलग लैब में अलग-अलग आने के कई कारण हो सकते हैं। आरटीपीसीआर तरीके से की गई जांच में 30 प्रतिशत तक फॉल्स निगेटिव आने की गुंजाइश रहती है। यानी इसमें रिपोर्ट पॉजिटिव भी नहीं होती और नेगेटिव भी पूरी तरह से नहीं होती। ऐसी स्थिति में मरीज को दोबारा जांच कराना पड़ता है। इसमें रिपोर्ट के पॉजिटिव आने की गुंजाइश ज्यादा रहती है। इसके अलावा सैंपल लेने के तरीका भी गड़बड़ रिपोर्ट आने के लिए काफी हद तक जिम्मेदार है। क्योंकि कई बार ट्रेंड स्टाफ न होने के कारण गलत तरीके से लिए गए सैंपल की रिपोर्ट भी अलग-अलग लैब में अलग-अलग परिणाम देती है। - डॉ. आरएस बेदी, पूर्व अध्यक्ष, आईएमए ।