सेना के जवानों की विधवाओं के लिए चंडीगढ़ आर्म्स फोर्स ट्रिब्यूनल ने एक राहत देने वाला फैसला सुनाया है।
ट्रिब्यूनल ने कहा कि यदि कोई विधवा उसी परिवार में पुनर्विवाह करती है तो उसे सेना की ओर से मिलने वाली पेंशन जारी रहेगी। रक्षा मंत्रालय इस गुजारा भत्ते को नहीं रोक सकता।
ट्रिब्यूनल की राजेश चंद्रा व नरेश वर्मा की बेंच ने रोपड़ की विधवा बलविंदर कौर की याचिका पर फैसला सुनाया है। विधवा पिछले दो दशक से अपनी पेंशन के लिए मंत्रालय से लड़ रही थी।
एडवोकेट अशोक शर्मा नाभेवाला ने बताया कि रोपड़ के वडाली गांव का रहने वाला रमेश भारतीय सेना में गनर था। 1987 में रोपड़ में एक ट्रेन दुर्घटना में रमेश की मौत हो गई।
21 जनवरी 1988 को उसकी पत्नी बलविंदर कौर को ऑर्डिनरी पेंशन मिलने लगी, लेकिन कुछ दिन बाद उसने अपने पति के भाई से दूसरी शादी कर ली तो मंत्रालय ने उसकी पेंशन बंद कर दी।
उसने 1996 में सीडीए इलाहाबाद में अर्जी दी कि उसकी बड़ी बेटी सुखविंदर कौर को पेंशन दी जाए पर उसे पेंशन नहीं मिली। बाद में उसकी शादी हो गई। उसके बाद छोटी बेटी सतनाम कौर को पेंशन देने के लिए दोबारा से अर्जी दी।
मंत्रालय की ओर से उसे दो साल तक पेंशन मिलती रही। उसकी भी शादी हो गई। साल 2010 में बलविंदर कौर ने चंडीगढ़ आर्म्स फोर्स ट्रिब्यूनल में अपनी याचिका डाली थी।
बलविंदर कौर की दलील थी कि आर्मी पेंशन रेगुलेशन एक्ट (1961) के मुताबिक अगर कोई विधवा अपने पति के परिवर के किसी सदस्य से शादी करती है, तब भी वह पेंशन के लिए हकदार है। पूरे 26 साल बाद उसे ट्रिब्यूनल से न्याय मिला है।
ट्रिब्यूनल के इस फैसले से उन सैकड़ों विधवाओं के केस को एक मजबूत आधार मिला है, जिनके पुनर्विवाह करने पर मंत्रालय उनकी पेंशन रोक देता था।
मंत्रालय की ओर से दलील दी जाती थी कि विधवा के पुनर्विवाह करने पर महिला का उसके पति व सेना से कोई ताल्लुक नहीं रहता है, इसलिए उसे गुजारा भत्ता नहीं दिया जा सकता।