हालत सुधरने में थोड़ा समय लगेगा, क्योंकि दवाएं कम हैं लेकिन जागरूक कर रहे हैं, ताकि अन्य पशुओं को प्रभावित होने से बचाया जा सके। वहीं गांवों के लोग देशी उपचार को तवज्जो दे रहे हैं। जब गांव वालों से बातचीत की तो उन्होंने कहा कि लंपी की दवा तो है नहीं फिर टीके से अच्छा तो देसी इलाज है।
गांव में लोग फिटकरी पिला रहे हैं। धूनी दे रहे हैं और कई तरह के लेप बनाकर लगा रहे हैं। लोगों ने कहा कि देशी इलाज में फायदा हो रहा है, थोड़ा समय जरूर लग जाएगा पर हमारे पशु मरेंगे नहीं। हमारे पशु कुछ खा-पी नहीं रहे, सरकारी पशु अस्पतालों के चिकित्सक गारंटी लें कि हमारी गायों को कुछ नहीं होगा तो हम तैयार हैं, जब पशु अस्पतालों में इलाज के दौरान पशु मर रहे हैं तो हम देशी इलाज ही करेंगे।
एनिमल हसबेंडरी के ज्वाइंट डायरेक्टर राम मित्तल ने बताया कि हालात बिगड़ते जा रहे हैं, क्योंकि लोग बाहर से पशु खरीदने से परहेज नहीं कर रहे। ये बीमारी बाहर के पशु खरीदकर यहां लाने से फैली है और अब पंजाब में 38331 गायें स्किन की बीमारी लंपी से प्रभावित हैं। जिसमें 866 ने दम तोड़ दिया है। गांवों की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है, जहां सरकारी इलाज नहीं मिल पा रहा और देसी तरीके से पशुओं की जान खतरे में डाल रहे हैं।