चंडीगढ़। प्रशासन के इंजीनियरिंग विभाग की कैपिटल प्रोजेक्ट डिवीजन नंबर-3 द्वारा सेक्टर-26 स्थित छह बूथों की मरम्मत के नाम पर किए गए भुगतान पर सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि मरम्मत कार्य अधूरा रहने के बावजूद ठेकेदार को जुलाई के पहले सप्ताह में 34.5 लाख रुपये का भुगतान मंजूर कर दिया गया। मौके पर बूथों की स्थिति अब भी जर्जर दिखाई दे रही है। कई स्थानों पर सरिया बाहर निकले हैं, दीवारें टूटी हुई हैं और बरामदों में सुरक्षा संबंधी खतरे बने हुए हैं।
जानकारी के अनुसार मरम्मत में बरामदे, बेसमेंट और छत का कार्य शामिल था लेकिन बेसमेंट की टूटी सीढ़ियों की मरम्मत तक नहीं कराई गई। बरामदों के नीचे दिखाई दे रहे सरियों पर केवल पुट्टी और सफेदी कर दी गई। छह में से केवल चार बूथों का फर्श बदला गया जबकि तीन बूथों पर ताले लगे हैं। एक फोटो स्टेट संचालक ने अपने बूथ का फर्श स्वयं ही बदलवाया हुआ है।
सेवानिवृत्त तकनीकी विशेषज्ञ का दावा- मौके पर सात लाख रुपये से अधिक का कार्य नहीं दिखा
एक सेवानिवृत्त तकनीकी विशेषज्ञ को मौके पर ले जाकर कार्य का निरीक्षण कराया गया। नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर विशेषज्ञ ने दावा किया कि मौके पर वास्तविक कार्य सात लाख रुपये से अधिक का नहीं दिखता। विशेषज्ञ ने एक अन्य गंभीर अनियमितता की ओर भी इशारा किया। उनके अनुसार 39.43,287 रुपये का कार्य कोटेशन के आधार पर कराया गया जबकि सीपीडब्ल्यूडी मैनुअल-2024 के अनुसार एक्सईएन को कोटेशन के जरिये केवल एक लाख रुपये तक के कार्य स्वीकृत करने का अधिकार है। वहीं, टेंडर जारी करने की सीमा 15 लाख रुपये तक है। विशेषज्ञ का कहना है कि चीफ इंजीनियर भी एक्सईएन को इस राशि का कोटेशन वर्क स्वीकृत नहीं कर सकते। ऐसे मामलों में शॉर्ट टेंडर की प्रक्रिया अपनाई जाती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि एक्सईएन ने 3 जून को एसडीओ को पत्र लिखकर मैसर्ज इन ऑडनाहक कंस्ट्रक्शन, सेक्टर-49सी को ही कार्य देने की बात कही जबकि किसी एक कंपनी को सीधे कोटेशन पर कार्य देने का निर्देश देना भी नियमों के विपरीत है।
मामले पर पूछे जाने पर चीफ इंजीनियर ने कहा कि सेक्टर-26 बूथों की मरम्मत को लेकर कोर्ट में मामला लंबित था। कोर्ट में अवमानना (कंटेम्प्ट) की स्थिति बनने के बाद विभाग ने ढाई महीने में काम पूरा करने का आश्वासन दिया था। इसी कारण कोटेशन के आधार पर मरम्मत कराई गई। हालांकि, जब उनसे पूछा गया कि सीपीडब्ल्यूडी मैनुअल के अनुसार एक लाख रुपये से अधिक का कोटेशन वर्क कराने का अधिकार एक्सईएन को नहीं है, तो उन्होंने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। वहीं, अधूरे कार्य के बावजूद पूरे भुगतान के सवाल पर चीफ इंजीनियर ने कहा, ‘सारा काम पूरा होने के बाद ही ठेकेदार को भुगतान जारी किया गया है।’
उठते सवाल
जब काम अधूरा था तो ठेकेदार को 34.56 लाख रुपये का पूरा भुगतान किस आधार पर किया गया?
यदि मौके पर सात लाख रुपये के आसपास ही काम हुआ तो बाकी राशि का हिसाब कौन देगा?
सीपीडब्ल्यूडी मैनुअल-2024 के बावजूद 39.43 लाख रुपये का कोटेशन वर्क किस नियम के तहत मंजूर किया गया?
कोर्ट केस का हवाला देकर टेंडर प्रक्रिया से बचना कितना नियमसम्मत था?
एक ही कंपनी को काम देने की सिफारिश किस आधार पर की गई?
क्या भुगतान से पहले किसी वरिष्ठ अधिकारी ने मौके पर कार्य का भौतिक सत्यापन किया था?
यदि पूरा काम हो चुका है तो मौके पर अब भी टूटी दीवारें और बाहर निकले सरिये क्यों दिखाई दे रहे हैं?
इंजीनियरिंग विभाग के कार्यों का थर्ड पार्टी तकनीकी ऑडिट क्यों नहीं कराया जाता?
क्या इस मामले में भुगतान और कार्य की गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी?