छोटी उम्र में मोबाइल फोन का अधिक इस्तेमाल, पढ़ाई का तनाव और मीडिया के विभिन्न साधनों का प्रभाव और पारिवारिक कलह जैसे कारण बच्चों को असमय आत्महत्या की ओर धकेल रहे हैं। पुलिस की फाइलों में दर्ज आंकड़े इस बात के गवाह हैं। पिछले तीन सालों के आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो चंडीगढ़ में अब तक 18 वर्ष से कम उम्र के 33 बच्चों ने अपनी जान दी है।
इसमें सबसे अधिक मामले मौली जागरां थाना के हैं। साल 2021 में 11 बच्चों ने खुदकुशी की, जिसमें छह लड़कियां शामिल थीं। वहीं 2022 में आत्महत्या के 12 मामलों में से 10 लड़कियों के रहे। 2023 की बात करें तो पुलिस विभाग से मिली जानकारी के अनुसार 30 सितंबर तक बच्चों की आत्महत्या के 10 मामले दर्ज हुए हैं। मौली जागरां थाने में 2021 में तीन, 2022 में चार और 2023 में अब तक तीन बच्चों के आत्महत्या के केस आए हैं। वहीं सेक्टर तीन, 17, 19 और 49 थाना में तीन सालों में एक भी बच्चे का आत्महत्या का मामला नहीं आया। इसके अलावा अन्य 11 थानों में एक-दो केस दर्ज हुए।
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18 वर्ष से कम आयु के इतने बच्चों ने की आत्महत्या
वर्ष लड़का लड़की कुल
2021 5 6 11
2022 2 10 12
2023 6 4 10 (30 सितंबर तक)
बच्चों से रखें दोस्ताना व्यवहार
बच्चों में आत्महत्या की प्रवृति पर बात करते हुए काउंसलर डॉ. परवीन पुनिया ने बताया इसके कई कारण हो सकते हैं। लेकिन कुछ आम कारक हैं जिससे बच्चे प्रभावित हो रहे हैं। इसमें मोबाइल फोन का इस्तेमाल, मीडिया का प्रभाव और परिवार से पर्याप्त समय और प्यार न मिल पाना मुख्य कारक हैं। मोबाइल फोन पर चंद सेकेंड में टाइप कर बच्चों को तुरंत परिणाम मिल जाते हैं। बच्चों को फोन की दुनिया में तुरंत चीजें मिल जाती है पर असल जिंदगी में हमेशा क्विक फिक्स समाधान काम नहीं आते और कोई गलती करने या कुछ हो जाने पर बच्चे घबरा जाते हैं। इससे बच्चों की सहनशीलता और धैर्य कम हुआ है। फिल्मों, सोशल मीडिया और अन्य मीडिया पर वह किस तरह का कॉन्टेंट देख रहे हैं इस पर कोई नियंत्रण नहीं है। उन्होंने बताया कि बच्चे इस तरह के कदम न उठाएं, इसलिए माता-पिता बच्चों से दोस्ताना व्यवहार रखें और उनके साथ क्लालिटी टाइम बिताएं।
स्कूलों में काउंसलिंग का वातावरण नहीं
नाम न बताने की शर्त पर एक काउंसलर ने बताया कि स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य और शिक्षा का इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है। सभी स्कूलों में अलग से काउंसलिंग रूम नहीं बने जहां विद्यार्थी काउंसलर से खुल कर बात कर सके। इसके अलावा बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य कैसे बेहतर किया जाए इसे लेकर कोई दिशानिर्देश नहीं है। स्कूल में काउंसलर नियुक्त कर देना काफी नहीं, मानसिक स्वास्थ्य को लेकर को बच्चों तक पहुंचाना जरूरी है। जब तक बच्चे काउंसलर या माता-पिता के पास अपने मन की बात नहीं कहेंगे इस तरह की घटनाओं का समाप्त होना मुश्किल है। इसके लिए स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य पर जागरूकता और काउंसलर की उपलब्धता जरूरी है।
सभी स्कूलों में काउंसलर के लिए अलग से स्पेस दिया है। कुछ स्कूलों में यह कमी हो सकती है लेकिन सभी में नहीं है। मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर करने के लिए काउंसलर के लिए आवासीय प्रशिक्षण देने का प्रावधान करेंगे। -
हरसुहिंदर पाल सिंह बराड़, स्कूल शिक्षा निदेशक