शरीर में न रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता और न ही बीमारी से लड़ने की क्षमता। ऐसे में महंगे इलाज के लिए खर्च करना जरा मुश्किल है। पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल एजूकेशन एंड रिसर्च में ऐसे ही तीन सौ बच्चों और बड़ों की जिंदगी लगी है दांव पर।
इनको चाहिए हर महीने 20 हजार रुपये के इंजेक्शन, नहीं मिले तो समझो जिंदगी लग गई दांव पर। पीजीआई के डिपार्टमेंट आफ पीड्रियाट्रिक एलर्जी एंड इम्युनोलाजी यूनिट में बुधवार को ऐसे ही तीन बच्चे और उनके अभिभावक मौजूद थे। विभाग के प्रोफेसर डाक्टर सुरजीत सिंह ने बताया कि मानव शरीर में दो सौ डिसआर्डर होते हैं।
प्राइमरी इम्यून डिफीशिएंसी काफी गंभीर प्राइमरी इम्यून डिफीशिएंसी है। यह जेनेटिक है। बच्चे किसी भी बीमारी से इस डिसआर्डर होने पर लड़ नहीं पाते। पीजीआई की प्रोफेसर शोभा सहगल ने इस बीमारी के लिए टेस्ट और डायगनोज करने की मुहिम शुरू की। पीजीआई में अभी इस बीमारी के लिए सभी टेस्ट होते हैं। सिर्फ जेनेटिक टेस्ट नहीं होते हैं यानी जींस के टेस्ट नहीं हो पाते। जींस सेल को रेगुलेट करते हैं।
प्रोफेसर सुरजीत सिंह ने कहा कि माइल्डर वर्ग में प्रोफेलेक्टिक एंटीबायटिक लो डोजेज होती हैं। उसके बाद सेकेंड ग्रुप आफ डिसआर्डर में गामा ग्लोबिलन इंट्रावीनस दिया जाता है। गामा ग्लोबिलिन वर्ष 1990 से उपलब्ध करवाया गया है। अब इसके दाम कम हो चुके हैं।
पांच ग्राम आफ दिस इंजेक्शन 8500 रुपये का है। हरेक बच्चे को दस से पंद्रह ग्राम की आवश्यकता है। जैसे जैसे बच्चा बड़ा होता है उसको ज्यादा आवश्यकता होता है। उन्होंने कहा कि विदेश में इसका इलाज इंश्योरेंस या हेल्थ सेक्टर द्वारा करवाया जाता है।
हरजसन दो साल का था, वह लगातार बीमार रहता था। कई बार शरीर में इंफेक्शन हुआ। हाईफीवर हुआ और आंखों की समस्या भी हुई। जालंधर में दिखाया। पीजीआई में आए तो पता लगा कि प्राइमरी इम्यून डिसआर्डर की वजह से ऐसा होता है। इसमें रोगनिरोधक क्षमता हैं ही नहीं। इस बीमारी में हर महीने दो इंजेक्शन लगते हैं। जिसकी कीमत पहले 27 हजार रुपये थी, अब यह 19 हजार रुपये प्रति माह तक पहुंच गई है।
तेजिंदर कौर, कपूरथला
मोहम्मद हसन चार महीने का था तो उसको निमोनिया हो गया। फिर उसे कोल्ड, फीवर और डायरिया होने लगा। दो साल की उम्र में कान का इंफेक्शन हुआ। पहले बंगलूरु में इम्युनोलॉजी सेंटर में दिखाया, पांच साल दूसरे डाक्टरों के पास जाते रहे, पांच पास बाद नी कैप की समस्या हुई तो डाक्टरों ने बताया कि उसको आईजीजी डिफीसिएंसी है। डाक्टरों ने पीजीआई चंडीगढ़ में रेफर कर दिया। इस बीमारी का इलाज महंगा है इसी वजह से मैने बंगलूरु में सोसायटी बना ली है। इसके माध्यम से इस बीमारी से पीड़ित लोगों की मदद की जाती है। प्राइमरी इम्युुनो डिफीशिएंसी पेशेंट वेलफेयर सोसायटी की रिकमंडेशन के माध्यम से अबकी बार कर्नाटक के बजट में इसको शामिल किया गया है। वहां यदि इस बीमारी के लिए फ्री इलाज मिलता है तो लाभ होगा।
रुखसाना, बंगलूरु
मेरे बेटे स्वास्तिक वर्मा को आठ दिन से फीवर था। इसमें निमोनिया, खांसी होने लगा। इसके बाद अंबाला में इलाज करवाया। वर्ष 2003 में उसको पीजीआई लाई। बेटे का इलाज पहले कम खर्च में होता था, अब यह ट्रीटमेंट महंगा हो चुका है।
मनीता वर्मा, अंबाला सिटी
एनजीओ ने दी है जिंदगी
प्राइमरी इम्यून डिफीशिएंसी में बचाव सिर्फ इंजेक्शन के माध्यम से होता है। पीजीआई में इलाज है, लेकिन खर्च ज्यादा है। इस बीमारी के लिए लगाया जाने वाला इंजेक्शन गामा ग्लोबिलिन उपलब्ध है, लेकिन इसके पांच ग्राम की कीमत 8500 रुपये है। इसमें बच्चों को करीब पंद्रह ग्राम का इंजेक्शन लगता है। जिसमें बीस से चौबीस हजार रुपये का खर्च आता है। इसके लिए सिटी के एनजीओ मदद कर रहे हैं। इसमें अहम योगदान दे रहे कुसुम अरोड़ा मेमोरियल ट्रस्ट के प्रतिनिधि एयर मार्शल आरएस बेदी, पीड्रियाट्रिक्स मेडिकल सपोर्ट सोसायटी के विवेक कपूर, सुखमनी फाउंडेशन की गुरशबनम कौर, गाड्स चाइल्ड फाउंडेशन की शालिनी मेहता, मिसेज मिल्खा सिंह, नन्हीं जान फाउंडेशन शामिल हैं।
प्रोफेसर शोभा सहगल ने की पहल
पीजीआई की पूर्व प्रोफेसर शोभा सहगल की पहल ने पीजीआई में इस बीमारी से लड़ने का सेटअप तैयार करवाया। पीजीआई में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद डा. शोभा ने अपील की कि राज्य सरकारों को इस बीमारी से लड़ने के लिए इलाज फ्री देना चाहिए।