जिस स्टीम इंजन ने इंडियन रेलवे में एक सदी से भी ज्यादा यानी सौ साल से भी ज्यादा सेवाएं दीं। वह मौजूदा समय में तीन बार ट्रायल में फेल हो चुका है। शनिवार को रेलवे के तीसरे ट्रायल में हांफकर फेल हुआ ये स्टीम इंजन रेलवे में करीब 120 साल तक पटरी पर दौड़ चुका है। 1977 के दौरान देश में डीजल इंजन का प्रचलन शुरू हुआ। इससे पुराने स्टीम इंजन लगभग बंद हो गए।
उस समय प्रचलन से बाहर हुए स्टीम इंजन में रेलवे का ये इंजन भी शामिल था। जो पठानकोट से हिमाचल जाने वाली नैरोगेज पटरी पर दौड़ा करता था। लेकिन अब ये इंजन रेलवे के प्रयासों के बाद भी चलने को तैयार नहीं है। 1977 में प्रचलन से बाहर होते समय ये इंजन करीब 120 साल की सेवाएं रेलवे में पूरी कर चुका था। इसके बाद ये खाली ही पड़ा था। दोबारा चलाने के उद्देश्य से इसे अमृतसर भेजा गया।
वहां 11 साल इसकी रिपेयरिंग का काम चलता रहा। 11 साल बाद इसे इसी साल पठानकोट लाया गया। यहां इसके तीन ट्रायल हुए। जिनमें ये फेल रहा। पहला ट्रायल रेलवे ने लोको शेड के अंदर ही लिया था। दूसरे ट्रायल में इंजन स्टेशन से बाहर नहीं निकल पाया और तीसरे ट्रायल में ये स्टेशन से थोड़ा बाहर आते ही जाम हो गया। फिलहाल रेलवे इस इंजन की रिपेयरिंग कर रहा है। जल्द ही इसका दोबारा ट्रायल लिया जाएगा।
रेलवे के अनुसार इसका एक बार फिर ट्रायल लिया जाएगा। यदि ये पास हुआ तो इसे पठानकोट से हिमाचल के पालमपुर तक चलाया जाएगा। इस स्टीम इंजन को दोबारा चलाने के पीछे रेलवे का उद्देश्य पर्यटन को बढ़ावा देना है। रेलवे का मानना है कि इस प्रकार के स्टीम इंजन पर्यटकों को खूब भाते हैं। पर्यटक ऐसे इंजनों के डिजाइन, भाप और भाप के प्रेशर से बनने वाली आवाज तक सब खूब पसंद करते हैं और यदि ऐसे खूबसूरत इंजन को हिमाचल की वादियों में दौड़ाया जाये तो नजारा ही कुछ और होगा।
ये नजारा बॉलीवुड की पुरानी फिल्म की शूटिंग से कम नहीं होगा। ऐसे में इस इंजन को चलाकर पर्यटकों को आसानी से आकर्षित किया जा सकता है।