प्रदेश में गढ़वाली और कुमाऊंनी एकेडमी जल्द स्थापित की जाएगी, इसके लिए शासन स्तर पर कवायद शुरू की जा रही है। इससे अपनी बोली को जहां सम्मान मिलेगा, वहीं दोनों बोलियों को भाषा का दर्ज दिलाने के लिए नेताओं पर दबाव भी बढ़ेगा।
मालूम हो कि गढ़राजाओं और चंद शासनकाल में दोनों ही बोलियों को राजभाषा का दर्जा हासिल था। पिछले दिनों शासन ने गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी और रं को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करके सकारात्मक पहल की है।
मैथिली, बोडो और कोकणी से कही अधिक लोग गढ़वाली, कुमाऊंनी बोलते हैं। 1560-1790 ईसवी तक सभी शासकीय कार्य गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषा में होते थे। तामपत्रों, शिलालेखों एवं सरकारी दस्तावेजों में इसके अभिलेखीय प्रमाण मौजूद हैं।
सन 1905 में गढ़वाल यूनियन नामक संस्थान से तारादत्त गैरोला और विश्वंभर दत्त चंदोला ने गढ़वाली पत्रिका का संपादन शुरू किया।