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हेल्थ इंश्योरेंस ले रहे हैं तो जान लें ये अहम बातें

Mon, 27 May 2013 06:01 PM IST
याशीष दहिया (सीईओ, पॉलिसी बाजार डॉट कॉम)
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हेल्थ इंश्योरेंस बड़े मेडिकल खर्चों से सुरक्षा का एक कारगर उपाय है। यह खर्च किसी बीमारी के इलाज, ऑपरेशन या किसी दुर्घटना के चलते अस्पताल में भर्ती होने के चलते हो सकता है।
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आजकल इलाज के भारी-भरकम खर्च को देखते हुए वित्तीय सुरक्षा का इंतजाम करना बेहद जरूरी हो गया है, ताकि जरूरत के समय पैसों के लिए आपको इधर-उधर भटकना न पड़े।

हेल्थ इंश्योरेंस इसी जरूरत को पूरा कर आपको एक वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है। इसके अलावा आयकर में छूट के प्रावधानों के चलते हेल्थ इंश्योरेंस आपकी टैक्स प्लानिंग का अहम हिस्सा भी हो सकता है।
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कैसे काम करता है हेल्थ इंश्योरेंस
हेल्थ इंश्योरेंस बीमा कराने वाले व्यक्ति और बीमा कंपनी के बीच एक करार के रूप में काम करता है।

इसमें ग्राहक बीमा कंपनी को एक तयशुदा रकम सालाना प्रीमियम के रूप में अदा करता है, जिसके एवज में बीमा कंपनी ग्राहक के अस्पताल में भर्ती होने पर उसके इलाज संबंधी खर्चों का वहन करती है।

बीमा कंपनी द्वारा वहन की जाने वाली यह रकम बीमा पॉलिसी की शर्तों व दायरे के मुताबिक होती है और पॉलिसी डॉक्यूमेंट में इससे संबंधित प्रावधानों का स्पष्ट रूप से उल्लेख रहता है।

मोटे तौर पर कंपनी द्वारा इलाज के लिए दी जाने वाली अधिकतम राशि बीमा पॉलिसी के सम एश्योर्ड के बराबर होती है।

हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी के तहत किसी एक व्यक्ति या उसके परिवार के सभी सदस्यों तक को बीमा कवरेज मिल सकता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपने किस तर का बीमा प्लान ले रखा है।

इस तरह तय होता है प्रीमियम
उम्र
प्रीमियम की रकम निर्धारित करने वाला पहला आधार होता है ग्राहक की उम्र। कम उम्र वाले बीमाधारक को अधिक उम्र वाले से कम प्रीमियम का भुगतान करना होता है।

ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि कम उम्र वाले ग्राहक की पॉलिसी की अवधि लंबी होती है, जिसके चलते उसकी प्रीमियम की राशि ज्यादा किस्तों में बंट जाती है और सालाना प्रीमियम कम बैठता है।

कवरेज की राशि
प्रीमियम तय करने का दूसरा मुख्य आधार बीमा कवरेज की राशि होती है। ज्यादा राशि का कवरेज हासिल करने के लिए ग्राहक को स्वाभाविक रूप से ज्यादा प्रीमियम अदा करना होगा।

पॉलिसी का प्रकार
पॉलिसी के प्रकार अर्थात इंडीविजुअल या फ्लोटर पर भी प्रीमियम निर्भर करता है। पॉलिसी के तहत जितने अधिक लोग आते हैं, उसी हिसाब से प्रीमियम की राशि बढ़ती जाती है।

सेहत
बीमा कराने वाले व्यक्ति के स्वास्थ्य की स्थिति की भी प्रीमियम तय करने में भूमिका होती है। धूम्रपान करने वाले व्यक्ति (स्मोकर) को धूम्रपान न करने वाले (नॉन स्मोकर) से अधिक प्रीमियम देना पड़ता है।

ले सकते हैं कई तरह के एड-ऑन
बेसिक हेल्थ इंश्योरेंस के अलावा विभिन्न प्रकार के एड-ऑन विकल्पों को चुनकर पॉलिसी के दायरे व सुविधाओं को बढ़ाया जा सकता है। यह कम खर्च में बेहतर बीमा सुरक्षा हासिल करने का अवसर प्रदान करते हैं।

ओपीडी राइडर
आउट पेशेंट डिपार्टमेंट विजिट अर्थात अस्पताल में भर्ती हुए बिना इलाज कराने के खर्च आमतौर पर हेल्थ इंश्योरेंस में शामिल नहीं होते।

इसके अलावा कई बार व्यक्ति सीधे अस्पताल में भर्ती होने के बजाय पहले ओपीडी में खुद को दिखाता है, जिसके बाद स्थिति को देखते हुए डॉक्टर तय करते हैं कि व्यक्ति को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत है या नहीं।

ऐसे में आमतौर पर ओपीडी से जुड़े खर्चों का भुगतान बीमा कंपनी नहीं करती, पर ओपीडी राइडर लेकर आप इसे अपनी पॉलिसी में शामिल करा सकते हैं। कई बीमा कंपनियां क्लबिंग के तहत यह एड-ऑन पॉलिसी धारकों को उपलब्ध करा रही हैं।

ई-ओपिनियन राइडर
कई बार हमें जरूरत महसूस होती है कि बीमारी के बारे में किसी विशेषज्ञ डॉक्टर से या विदेश के किसी जानेमाने डॉक्टर से परामर्श ले ली जाए, ताकि ज्यादा बेहतर व कारगर इलाज हो सके। यह परामर्श अपने मेडिकल डॉक्यूमेंट व रिपोर्टों की डिजिटल या स्कैन प्रति ई-मेल के जरिये भेज कर हासिल की जा सकती है।

ई-कंसल्टेशन के बढ़ते चलन के बीच इसकी फीस भी बढ़ती जा रही है। यह डॉक्टर की व्यस्तता और मुद्रा के भाव में उतार-चढ़ाव पर भी निर्भर करती है। ई-ओपिनियन राइडर लेकर इस खर्च को बीमा कवर में शामिल किया जा सकता है। गंभीर बीमारियों के मामले में यह खासा कारगर साबित होता है।

ग्राहकों को कई तरह के मिलते हैं विकल्प
मौजूदा तौर में बीमा कंपनियां हेल्थ इंश्योरेंस के तहत ग्राहकों को उनकी जरूरतों और प्रीमियम अदायगी की क्षमता के अनुरूप कई तरह की पॉलिसियों के विकल्प उपलब्ध करा रही हैं। इसलिए बाजार में आज दर्जनों नहीं, सैकड़ों तरह की स्वास्थ्य बीमा योजनाएं उपलब्ध हैं। मोटे तौर पर इन्हें चार वर्गों में रखा जा सकता है।

--इंडिविजुअल पॉलिसी (व्यक्तिगत बीमा)
--फैमिली फ्लोटर प्लान (पारिवारिक बीमा)
--ग्रुप इंश्योरेंस प्लान (समूह बीमा)
--ओवरसीज प्लान(अंतरराष्ट्रीय बीमा पॉलिसी)

हेल्थ इंश्योरेंस के इन सभी विकल्पों की प्रकृति इनके नाम के अनुरूप ही होती है। इंडिविजुअल पॉलिसी में केवल पॉलिसी खरीदने वाले बीमाधारक को ही बीमा कवर मिलता है।

इसी तरह फैमिली फ्लोटर में पूरे परिवार को बीमा कवर उपलब्ध कराया जाता है, जबकि ग्रुप हेल्थ इंश्योरेंस में किसी समूह विशेष के सभी सदस्यों को बीमा कवर मिलता है।

यह समूह किसी कंपनी के कर्मचारियों का, किसी क्लब के सदस्यों का अथवा किसी एसोसिएशन या सहकारी संघ (को-ऑपरेटिव सोसाइटी) के सदस्यों का हो सकता है।

ओवरसीज हेल्थ इंश्योरेंस की बात करें, तो यह तयशुदा अवधि के दौरान विदेश यात्रा के दौरान होने वाले मेडिकल खर्च को कवर करता है। यह खर्च कोई बीमारी होने या दुर्घटना के चलते अस्पताल में भर्ती होने पर हो सकता है।

टैक्स की भी बचत
हेल्थ इंश्योरेंस न केवल स्वास्थ्य संबंधी खर्चों से सुरक्षा प्रदान करता है, बल्कि आयकर की बचत भी कराता है। धारा 80 डी के तहत प्रीमियम पर आयकर छूट हासिल की जा सकती है। खुद के अलावा अपने माता-पिता का तथा अन्य आश्रितों का स्वास्थ्य बीमा करा कर उनके प्रीमियम पर भी आयकर छूट पाई जा सकती है।

प्री व पोस्ट हॉस्पिटलाइजेशन खर्च
प्री हॉस्पिटलाइजेशन खर्चों में व्यक्ति को अस्पताल में भर्ती किए जाने से पहले के स्वास्थ्य जांच व दवाओं का खर्च आता है। अकसर मरीज को अस्पताल में भर्ती करने से पहले उसकी हालत जानने के लिए डॉक्टर कई तरह के टेस्ट कराने को कहते हैं।

इसी तरह मरीज की हालत में होने वाले सुधार को जांचने के लिए अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद भी कई दिनों तक कई तरह के टेस्ट कराने पड़ते हैं और अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी समय-समय पर डॉक्टर को दिखाना पड़ता है।

प्री व पोस्ट हॉस्प्टिलाइजेशन खर्च का राइडर लेकर इन सभी खर्चों को बीमा कवर के तहत शामिल किया जा सकता है।

ग्रेस पीरियड की जानकारी रखें
यदि किसी कारणवश या कोई परेशानी के चलते आप तय समय पर अपनी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी का रिन्यूवल नहीं का सकें, तो घबराने की जरूरत नहीं है। आप पॉलिसी रिन्यूवल तय समय से 15 दिन बाद तक करा सकते हैं। यानी, प्रत्येक पॉलिसी में रिन्यूवल के लिए 14-15 दिन का ग्रेस पीरियड मिलता है।

मेडीक्लेम का भुगतान बीमा कंपनियां दो तरह से रीइम्बर्समेंट और कैशलेस सेटलमेंट के जरिए करती हैं। रीइम्बर्समेंट व्यवस्था के तहत पॉलिसीधारक को पहले पूरा भुगतान करना पड़ता है, बाद में वह कंपनी को क्लेम फाइल कर भुगतान प्राप्त करता है।
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कैशलेस सेटलमेंट व्यवस्था के तहत बीमा कंपनी से संबद्ध जिस अस्पताल में उपचार कराया जा रहा है, कंपनी उस अस्पताल को उपचार पर आए खर्च का भुगतान करती है।
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