बीमा कराने के पीछे किसी भी व्यक्ति का पहला मकसद यही होता है कि उसके दुनिया में न रहने पर परिवार वालों का गुजारा ठीक ढंग से चलता रहे और उन्हें कोई आर्थिक दिक्कत न आने पाए।
इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर पॉलिसी खरीदने वाला व्यक्ति अपने बीमे की राशि, पॉलिसी की अवधि आदि को तय करता है और फिर पॉलिसी का प्रीमियम चुकाता है।
इन सावधानियों के बावजूद कई बार बीमे से जुड़े एक ऐसे महत्वपूर्ण पहलू पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता है, जोकि पॉलिसीधारक की मृत्यु होने पर उसके आश्रितों के लिए सबसे ज्यादा सहायक साबित होने वाला होता है। बीमे से जुड़ा यह अहम पहलू है इंश्योरेंस क्लेम का।
क्लेम के जरिये ही नॉमिनी को बीमे की राशि मिलती है। इसलिए पॉलिसीधारक के लिए यह जरूरी हो जाता है कि इंश्योरेंस क्लेम की प्रक्रिया और उससे जुड़ी कागजी कार्रवाई को न केवल खुद अच्छी तरह से समझ ले, बल्कि अपने आश्रितों, जिन्हें की बीमे का क्लेम मिलना है, को भी इससे भली भांति अवगत करा दे।
विभिन्न बीमा कंपनियों की इंश्योरेंस क्लेम प्रक्रिया में कुछ मामूली अंतर हो सकते हैं, पर मोटे तौर पर क्लेम की से जुड़ी कार्यवाही और उससे संबंधित दस्तावेज तकरीबन एक से ही होते हैं, जिनके बारे में समझ लेना काफी उपयोगी होता है।
क्लेम इंटीमेशन
क्लेम इंटीमेशन इंश्योरेंस क्लेम की प्रक्रिया से जुड़ा पहक्लेम इंटीमेशन ला कदम है। इसके जरिये नॉमिनी बीमा कंपनी को पॉलिसीधारक की मृत्यु के बारे में सूचित करते हुए क्लेम की प्रक्रिया शुरू करने का आग्रह करता है।
क्लेम इंटीमेशन बीमा कंपनी के ब्रांच ऑफिस जाकर या कंपनी की वेबसाइट पर ई-मेल भेज कर किया जा सकता है। इसमें बीमा कंपनियों को कुछ मूलभूत जानकारियां देनी होती हैं।
इनमें पॉलिसी नंबर, बीमित व्यक्ति (पॉलिसीधारक) का नाम, पॉलिसीधारक की मृत्यु की तारीख, मृत्यु का कारण, मृत्यु का स्थान, क्लेम करने वाले व्यक्ति का नाम, पॉलिसीधारक से क्लेम करने वाले व्यक्ति का रिश्ता जैसे विवरण शामिल होते हैं।
ध्यान रखें कि क्लेम इंटीमेशन खुद में क्लेम न होकर केवल कंपनी को दी जाने वाली एक प्राथमिक सूचना की तरह होता है और क्लेम संबंधी लिखत-पढ़त इसके बाद शुरू होती है।
क्लेम संबंधी जरूरतें
क्लेम हासिल करने के लिए नॉमिनी को कंपनी की ओर से जारी क्लेम फार्म भरकर उसके साथ जरूरी कागजात लगाकर कंपनी के कार्यालय में जमा करने होते हैं।
क्लेम के लिए पहला व सबसे जरूरी दस्तावेज नगर निकाय या ग्राम पंचायत द्वारा जारी का मृत्यु प्रमाणपत्र पत्र होता है, जिसे पॉलिसीधारक की मृत्यु का प्रमाण माना जाता है। क्लेम फार्म के साथ बीमा पॉलिसी की मूल प्रति लगाना भी जरूरी होता है।
इसके अलावा क्लेम करने वाले व्यक्ति (नॉमिनी) का फोटो, पहचान पत्र (आइडेंटिटी प्रूफ), पते का प्रमाण (एड्रेस प्रूफ) भी देना होता है। बीमा कंपनियां क्लेम फार्म के साथ नॉमिनी के बैंक खाते का स्टेटमेंट भी मांगती हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बीमे की रकम सही व्यक्ति के खाते में पहुंचेगी।
इसके अलावा क्लेम के मामले को देखते हुए जरूरत पड़ने पर मृत्यु के कारण और मृत्यु की परिस्थिति के बारे में भी प्रमाण मांग सकती हैं।
कंपनियां क्लेम के साथ जमा किए जाने वाले कागजात की मूल प्रतियां अथवा मजिस्ट्रेट, राजपत्रित अधिकारी, लोकल पुलिस इंस्पेक्टर या बीमा कंपनी के अधिकृत सदस्य द्वारा प्रमाणित (अटेस्टेड) होने चाहिए।
क्लेम दाखिल करने की समय-सीमा
क्लेम दाखिल करने के लिए औपचारिक तौर पर कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं है, पर क्लेम के निपटारे में बाधाओं व देरी से बचने के लिए बेहतर यही है कि पॉलिसीधारक की मृत्यु के बाद क्लेम जल्दी से जल्दी दाखिल कर दिया जाए।
कंपनी द्वारा मांगे गए सभी कागजात के साथ क्लेम दाखिल करने के बाद आमतौर पर क्लेम का निपटारा बिना देरी हो जाता है, पर इसमें अगर देरी होती दिखे तो क्लेमकर्ता कंपनी को पॉलिसी नंबर व क्लेम दाखिल करते वक्त उसे दिए गए क्लेम नंबर का हवाला देकर अपने क्लेम का स्टेटस जान सकता है।
क्लेम प्रोसेसिंग
क्लेम की प्रक्रिया के तहत मामले के निपटारे के लिए बीमा कंपनी द्वारा पॉलिसीधारक की मृत्यु की परिस्थितियों और कारण की पुष्टि (वेरीफिकेशन) की जा सकती है।
वेरिफिकेशन का उद्देश्य यह होता है कि केवल सही मामलों में ही बीमे के क्लेम भुगतान किया जाए। बीमा नियामक इरडा द्वारा क्लेम के वेरीफिकेशन के लिए 180 दिन की अवधि निर्धारित की गई है।
हालांकि सामान्यत: कंपनियां अपनी ओर से कम से कम समय में मामला निपटाने का प्रयास करती हैं, ताकि ग्राहकों का कंपनी के प्रति भरोसा और कंपनी की साख मजबूती के साथ बरकरार रहे।
शिकायतों का निपटारा
क्लेम के निपटारे में देरी या बाधा आने पर क्लेमकर्ता इसकी शिकायत कर मामले के ससमय निपटारे का आग्रह कर सकता है। इसके लिए पहले तो बीमा कंपनी के पास शिकायत भेजनी होती है।
कंपनी की ओर से संतोषजनक जवाब न मिलने या कार्रवाई न होने पर मामला बीमा नियामक इरडा के पास भी ले जाया जा सकता है। इरडा ने शिकायतों के निपटारे के लिए विशेष तौर पर एक इंटिग्रेटेड ग्रिवांस मैनेजमेंट सिस्टम (आईजीएमएस) बना रखा है।
इसके जरिये बीमा कंपनियों द्वारा मामले के निपटारे और शिकायतों के निवारण पर नजर रखी जाती है। साथ ही आईजीएमएस के जरिये इरडा क्लेम से जुड़े मूलभूत कारणों के आधार पर निपटारे में हो रही देरी आदि की अपने स्तर पर विवेचना भी करता है।
क्लेम निपटारे संबंधी इन व्यवस्थाओं के बावजूद मामले का उचित ढंग से निपटारा न होने पर क्लेमकर्ता उपभोक्ता अदालत व बीमा लोकपाल (इंश्योरेंस ओंबड्समैन) के पास भी अपना मामला ले जा सकता है।
क्लेमकर्ता को यह जान लेना चाहिए कि अगर उसका मामला वाजिब है और उसने निर्धारित कागजात उपलब्ध कराते हुए सही ढंग से क्लेम दाखिल किया है, तो बीमा कोई वजह नहीं कि बीमा कंपनी उसके क्लेम को अस्वीकार कर दे अथवा उसका निपटारा न करे।
क्लेम के निपटारे को लेकर बीमा कंपनियों को बीमा नियामक द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन करना पड़ता है। ऐसा न होने पर वह बीमा कंपनी के खिलाफ कानूनी तौर पर आवाज उठा सकता है।
साथ ही बीमाधारक को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि पॉलिसी के प्रपोजल फार्म में वह कंपनी द्वारा मांगी गई सारी जानकारियां सही-सही और स्पष्ट रूप से दे, ताकि उसके न रहने पर क्लेम के निपटारे में किसी तरह की अड़चन न आने पाए।