वास्तव में देखा जाए तो काफी कम इंश्योरेंस कंपनियों ने भारत के बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण की ओर से जारी गाइडलाइंस को लागू किया है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट इस पर केंद्र सरकार और भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण को नोटिस भेज चुका है कि ये नियम सभी कंपनियों पर लागू कराया जाए लेकिन इसकी अस्पष्टता और गैर-सहयोग के पीछे दो कारण हैं...
जोखिम का आकलन और कीमत
ये एक नए तरह का प्रोडक्ट है इसलिए कुछ कंपनियां इसके लिए कवर देने से कतरा रही है। मानसिक बीमारी का खर्चा निजी अस्पतालों में बहुत ज्यादा है, इसलिए कंपनियों को इसकी लागत का कोई अनुमान नहीं है। दूसरी ओर अगर सिर्फ कंपनी ग्रहकों को कवर देगी तभी इसकी लागत और प्रक्रिया के बारे में पता चल सकेगा।
कोई स्टैंडअलोन नहीं, सिर्फ मौजूदा प्लान में कवर
इसकी अस्पष्टता को लेकर दूसरा कारण यह है कि मान लीजिए कि इंश्योरेंस कंपनी ने मानसिक बीमारी के लिए कवर देना शुरू कर दिया तो इसके लिए कोई स्टैंडअलोन प्रोडक्ट नहीं है। कंपनियों ने इसे कवर देने के लिए कोई विशेष वर्ग नहीं बनाया है। अपने स्वास्थ्य बीमा के प्लान में इंश्योरेंस कंपनी मानसिक बीमारी के लिए मुश्किल से एक-दो कवर की ही पहचान कर पाते होंगी।
ऐसा इसलिए है क्योंकि कार्डियो और श्वास संबंधी शारीरिक बीमारी में भी कोई स्टैंडअलोन प्रोडक्ट नहीं है। इसलिए मानसिक बीमारी को विकसित बीमा प्लान में कवर दिया जाता है जिसमें अस्पताल के लिए इंश्योरेंस कवर होता है। अगर आपके पास पहले से कोई स्वास्थ्य बीमा है और किसी मानसिक बीमारी की वजह से आपको शारीरिक दिक्कत होने लगती है तो कंपनी आपको इसके लिए कवर देगी लेकिन अगर ऑनलाइन जाकर विशेष रूप से मानसिक बीमारी के लिए कवर देखेंगे तो यह आपको नहीं मिलेगा।
अगर आप विशेष तौर पर मानसिक बीमारी के लिए कवरेज की तलाश कर रहे हैं तो पहले ये देखिए कि क्या आपकी बीमारी के लिए अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत है या फिर ये इलाज और थैरेपी से ठीक हो सकती है। अगर मानसिक बीमारी के लिए कवर लेना है तो यही सलाह दी जाएगी कि ऐसा प्लान लें जिसमें अस्पताल में भर्ती को भी कवर किया जाए।
अगर किसी स्वतंत्र या निजी क्लीनिक में इस बीमारी का इलाज कराएंगे या थैरेपी लेंगे और काउंसलिंग कराएंगे तो इसके लिए आपको काफी पैसा खर्च करना पड़ सकता है। हर सेशन के लिए आपको एक हजार रुपये देने पड़ सकते हैं। इसमें कंसल्टेशन फीस और मेडिकल के खर्चे शामिल नहीं है जो प्रति कंसल्टेशन एक हजार रुपये हो सकते हैं।
क्या इंश्योरेंस कंपनी के सभी स्वास्थ्य प्लान में मानसिक बीमारी के लिए कवर मिलता है?
हर तरह का स्वास्थ्य बीमा मानसिक बीमारी को कवर करता है लेकिन सीमित शर्तों के साथ। एक विस्तृत स्वास्थ्य प्लान इस तरह की बीमारी को कवर कर सकता है। बाजार में मानसिक बीमारी के लिए स्टैंडअलोन कवरेज प्लान काफी कम हैं।
क्या सभी तरह की मानसिक बीमारियों के लिए इंश्योरेंस लेना जरूरी है?
भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण के निर्देशों के आधार पर हर तरह की मानसिक बीमारी के लिए इंश्योरेंस लेना जरूरी है। भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण के अनुसार एक अक्तूबर 2020 तक मानसिक बीमारी को बहिष्कार या बाधित श्रेणी से हटाने की डेडलाइन है।
क्या इन प्लान में सिर्फ अस्पताल का खर्च शामिल होगा?
ये इंश्योरेंस प्लान पर निर्भर करता है। अगर प्लान में ओपीडी इलाज को कवरेज नहीं है तभी अस्पताल में भर्ती वाले खर्चों के लिए कवरेज मिलेगा।
अगर मानसिक बीमारी से शरीर पर कोई असर पड़ता है, तो क्या उसके लिए कवरेज है?
हां, अगर मानसिक बीमारी की वजह से शारीरिक बीमारी बनती है या शरीर पर गलत प्रभाव पड़ता है तो इसका कवरेज मिलेगा। इंश्योरेंस कंपनी ऐसा करने से मना नहीं कर सकती है। उदाहरण के लिए अगर डिप्रेशन से हाइपरटेंशन की बीमारी होती है तो इंश्योरेंस कंपनी में इसके लिए कवर मिलेगा।
क्या कोई इंश्योरेंस कंपनी कवर देने से मना कर सकती है?
हां, शारीरिक बीमारी की तरह अगर मरने की संभावना ज्यादा हो या पहले से हुई बीमारी गंभीर रूप ले ले तो इंश्योरेंस कंपनी कुछ सीमित शर्ताें को हवाला देते हुए कवरेज देने से मना कर सकती है।