वित्तीय वर्ष 2023-24 के दौरान भारत में निवेश करने वाले विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) में सबसे अधिक संयुक्त राज्य अमेरिका की हिस्सेदारी रही। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) की एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है। सेबी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 31 मार्च, 2024 तक, भारत में पंजीकृत एफपीआई की कुल संख्या 11,219 तक पहुंच गई। इसमें पिछले वर्ष की तुलना में मामूली वृद्धि हुई है। पिछले साल यह संख्या 11,081 थी। कुल पंजीकृत एफपीआई में से, संयुक्त राज्य अमेरिका के निवेशकों की संख्या सबसे अधिक 3,457 रही।
सेबी की रिपोर्ट में विभिन्न देशों के एफपीआई निवेश की जानकारी दी गई है। इसके अनुसार संयुक्त राज्य अमेरिका 3,457 पंजीकृत एफपीआई के साथ सूची में सबसे ऊपर है, इसके बाद लक्जमबर्ग (1,393) और कनाडा (804) का नंबर है।
रिपोर्ट में एफपीआई के देश-वार वितरण का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। इसमें उनकी एसेट्स अंडर कस्टडी (एयूसी) शामिल है। एयूसी इन एफपीआई की ओर से प्रबंधित परिसंपत्तियों के कुल मूल्य की जानकारी देता है।
रिपोर्ट में एफपीआई की ओर से निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि की जानकारी दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च 2024 तक एफपीआई की ओर से निवेश 42.8% बढ़कर 69.5 लाख करोड़ हो गया है। यह पिछले वर्ष यानी 31 मार्च 2023 को 48.7 लाख करोड़ रुपये थे। यह वृद्धि भारतीय बाजार में विदेशी निवेशकों की बढ़ती रुचि को उजागर करता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुल एयूसी में इक्विटी एसेट्स की हिस्सेदारी 92.2 फीसदी रही है। इन इक्विटी परिसंपत्तियों में सबसे अधिक योगदान संयुक्त राज्य अमेरिका से आया, जिसका हिस्सा कुल 39.2 प्रतिशत था। इसके बाद सिंगापुर 9.8 प्रतिशत और लक्जमबर्ग 7.1 प्रतिशत का नंबर है। एयूसी में यह मजबूत वृद्धि, विशेष रूप से इक्विटी परिसंपत्तियों में, भारत के वित्तीय बाजारों में विदेशी निवेशकों की बढ़ती रुचि और विश्वास को दर्शाती है।
सेबी की रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि एफपीआई की ओर से वर्ष 2023-24 में 1992-93 के बाद से अब तक का सबसे अधिक निवेश किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार विदेशी पोर्टफोलियो निवेश और विदेशी उद्यम निवेश भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण हैं। विदेशी पोर्टफोलियो निवेश के मामले में वित्तीय वर्ष 2023-24 भारत के लिए एक असाधारण वर्ष रहा है।
भारत की वृद्धि दर में निरंतर लचीलापन, वित्तीय स्थिरता, मुद्रास्फीति पर नियंत्रण, राजकोषीय समेकन के साथ-साथ उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रास्फीति की निरंतरता, अनिश्चित भू-राजनीतिक परिदृश्यों आदि ने भारत में विदेशी प्रवाह को आकर्षित कर रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा दिया है।