उच्चतम न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ 'उद्योग' शब्द की परिभाषा की समीक्षा करेगी। यह पीठ 1978 के 'बेंगलुरु जल आपूर्ति और सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा' मामले में दी गई विस्तृत व्याख्या की वैधता की जांच करेगी। सुनवाई 17 मार्च को शुरू होकर 18 मार्च को समाप्त होगी।
16 फरवरी को पारित आदेश में मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कुछ प्रमुख मुद्दे उठाए थे। पहला मुद्दा यह है कि क्या बेंगलुरु जल आपूर्ति मामले में न्यायमूर्ति वीआर कृष्ण अय्यर द्वारा निर्धारित कसौटी सही है। यह कसौटी तय करती है कि कोई उपक्रम 'उद्योग' की परिभाषा में आता है या नहीं। पीठ यह भी देखेगी कि क्या 'औद्योगिक विवाद (संशोधन) अधिनियम, 1982' और 'औद्योगिक संबंध संहिता, 2020' का मूल अधिनियम में निहित 'उद्योग' शब्द की व्याख्या पर कोई कानूनी प्रभाव पड़ता है।
दूसरा मुद्दा यह है कि क्या सरकारी विभागों की सामाजिक कल्याण गतिविधियों और योजनाओं को औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2(जे) के लिए 'औद्योगिक गतिविधियां' मानी जा सकती हैं। तीसरा मुद्दा राज्य के उन कार्यों से संबंधित है जो 'संप्रभु कार्य' की अभिव्यक्ति के अंतर्गत आते हैं। पीठ यह भी तय करेगी कि क्या ऐसे कार्य अधिनियम की धारा 2(जे) के दायरे से बाहर होंगे। यह संदर्भ 2002 की एक अपील से आया है, जिसे 2005 और 2017 में बड़ी पीठों के पास भेजा गया था।