सरकार कथित तौर पर सहारा-सेबी रिफंड खाते में पड़े बिना दावे की राशि को सरकार की संचित निधि में स्थानांतरित करने की वैधता पर विचार कर रही है। हालांकि इसमें उन निवेशकों के लिए प्रावधान किए की उम्मीद है जो भविष्य में दावे करेंगे। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि इस फैसले पर समूह के संस्थापक सुब्रत रॉय के पिछले सप्ताह निधन के बाद विचार किया जा रहा है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि धन का उपयोग गरीबों की मदद के लिए चल रहे कार्यक्रमों या लोक कल्याण के लिए किए जाने की उम्मीद है। 31 मार्च तक समूह से वसूली गई और सरकारी बैंकों में जमा की गई कुल राशि 25,163 करोड़ रुपये थी, जबकि 48,326 खातों से जुड़े 17,526 आवेदनों के बदले 138 करोड़ रुपये का भुगतान निवेशकों को किया जा चुका है।
दूसरी ओर, वास्तविक जमाकर्ताओं के वैध बकाये के भुगतान के लिए सहकारी समितियों के केंद्रीय रजिस्ट्रार को 5,000 करोड़ रुपये हस्तांतरित किए गए थे। जिसके बाद गृह मंत्री अमित शाह ने रिफंड प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए सहारा के जमाकर्ताओं के लिए एक समर्पित पोर्टल लॉन्च किया था।
सहारा समूह की परेशानी 2010 में शुरू हुई जब सेबी ने सहारा की दो इकाइयों से इक्विटी बाजार से धन नहीं जुटाने या जनता को कोई प्रतिभूति जारी नहीं करने के निर्देश दिए। रॉय को बाद में 2014 में गिरफ्तार किया गया था, जब वह अवमानना मामले में अदालत में पेश नहीं हुए। यह मामला उनकी कंपनियों द्वारा निवेशकों को 20,000 करोड़ रुपये से अधिक नहीं लौटाने से जुड़ा था।
सहारा को निवेशकों को आगे रिफंड के लिए सेबी के पास अनुमानित 24,000 करोड़ रुपये जमा कराने को कहा गया था। समूह ने कहा था कि उन्होंने 95 प्रतिशत राशि निवेशकों को सीधे रिफंड कर दिया है और सेबी की ओर से 24000 करोड़ लौटाने का फरमान 'दोहरे भुगतान' जैसा है।