अपने 80 वर्षीय चाचा से मिला, जो अब भी काफी फिट हैं। उनके तीन बच्चे हैं, जो अलग-अलग देशों में बसे हैं। चाची का निधन तब हो गया था, जब चाचा 50 वर्ष के भी नहीं थे। 1990 के दशक के मध्य में सरकारी कंपनी से जनरल मैनेजर के रूप में सेवानिवृत्त होने के बावजूद उन्होंने खुद को आर्थिक रूप से सक्षम बनाए रखा है। मैंने सोचा कि इस बारे में उनके विचार जानना अच्छा होगा कि उम्र बढ़ने के साथ बुजुर्गों को पैसे का प्रबंधन कैसे करना चाहिए।
1980 के दशक में दो बेटियों की शादी करने, पत्नी को जल्दी खो देने व बेटे को शिक्षित करने की प्रतिबद्धताओं के बावजूद उनका खुद के लिए बेहतर करते रहना अनुकरणीय है। वह सरकारी क्वार्टर में रहे क्योंकि उन्हें खुद के घर की जरूरत नहीं महसूस हुई। उनका पूरा ध्यान तीनों बच्चों को शिक्षित करने पर था, जिसमें वह कामयाब हुए। दोनों बेटियों ने स्नातक किया। एक ने बैंक में नौकरी कर ली। दूसरी ने शादी के बाद काम छोड़ने का फैसला किया। चचेरे भाई ने इंजीनियरिंग की और चाचा के सेवानिवृत्त होने के बाद 1990 के दशक के अंत में अपने दम पर मास्टर डिग्री के लिए विदेश चला गया। इससे यह सीख मिलती है कि अपने बच्चों को उनकी सर्वोत्तम क्षमता के अनुरूप मूल्यों के साथ शिक्षित करें।
चाचा जब सेवानिवृत्त हुए तो उनके पास तीन बेडरूम वाला एक क्वार्टर था। उन्हें अपने लिए बड़े घर की आवश्यकता नहीं थी। इसलिए, उन्होंने अपने क्वार्टर के एक कमरे का उपयोग उन बच्चों के लिए स्टडी रूम के रूप में किया, जिन्हें अपने घरों में पढ़ाई को लेकर जगह की समस्या थी। जहां तक कार-शेड की बात है तो वह इसका इस्तेमाल हर सप्ताहांत नौकरों के बच्चों को पढ़ाने के लिए करने लगे।
सबक: अपनी क्षमता के भीतर जिएं और जो आपके आसपास जरूरतमंद हैं, उनकी मदद करते रहें।
चाचा जब सेवानिवृत्त हो गए, तो वह अपने बच्चों में से किसी के साथ रहने लगे। वह उनकी सुविधा के अनुसार समय-समय पर उनके साथ रहते थे। बच्चे जब उनसे मिलने आएंगे तो उनके परिवारों को ठहराने के लिए उन्हें बड़ी जगह की जरूरत होगी। फिर भी उन्होंने बड़ा घर नहीं लिया। जब उन्हें पता चलता था कि बच्चों का पूरा परिवार उनसे मिलने आने वाला है तो वह एक और फ्लैट किराये पर ले लेते थे।
सबक: जीवन में परिस्थितियां बदलने के साथ अपनी जरूरतें बढ़ाने और घटाने के लिए तैयार रहें।
जरूर लें सीख
अधिकांश पेंशनभोगियों के उलट उन्होंने अपनी पेंशन का हिस्सा कम्यूट नहीं किया। कम्यूट का मतलब है कि रिटायरमेंट राशि से एक बड़ी रकम लेने और फिर शेष बचे पैसे का उपयोग जीवनभर नियमित पेंशन के लिए किया जाता है। ऐसा न करने से आज वह अच्छी खासी पेंशन पा रहे हैं। उन्होंने रिटायर होने के बाद सरप्लस को स्टॉक और म्यूचुअल फंड में निवेश करना शुरू कर दिया। इसके पीछे उनका तर्क यह था कि अब उनके पास सबकुछ जानने का समय है और वह समझ सकते हैं कि कम ब्याज दरों वाले एफडी की तुलना में क्या कर रहे हैं।
सबक: ऐसे वित्तीय साधन का चुनाव करें, जिन्हें आप समझते हैं, न कि दूसरे लोग। जो सब करते हैं, उसके पीछे कभी भी न भागें।
जब वह 80 वर्ष के हुए, तो रिटायरमेंट वाले कम्यूनिटी में चले गए। जब मैंने उनसे पूछा कि वह बच्चों और रिश्तेदारों से दूर क्यों जा रहे हैं, तो उनका जवाब दिलचस्प था। उन्होंने कहा, स्वास्थ्य ठीक होने के बावजूद अब वह चीजों पर लगातार नजर रखने में सक्षम नहीं हैं। लेकिन, उन्हें कंपनी की याद आ रही थी। उन्हें समय बिताना मुश्किल लग रहा था।
सबक: अपने आप को बदलते समय के अनुसार ढालें ताकि एक संपूर्ण जीवन जी सकें। इसमें सीमाएं आपकी राह में बाधा न बनें।
प्रियजनों के साथ रहें, लेकिन बोझ बनने की कीमत पर नहीं
चाचा ने हर स्तर पर एक वसीयत बनाई है। इसमें स्पष्ट है कि उनके जाने के बाद उनकी इच्छाएं क्या हैं। मैंने कोई दूसरा व्यक्ति नहीं देखा, जिसने अपना जीवन इतने सरल फिर भी सार्थक और प्रभावशाली तरीके से जिया हो। मैं उनकी वसीयत को एक्सक्यूट करने वाला हूं। आपको बता सकता हूं कि दुनिया के तौर-तरीकों के बारे में उनकी समझ एक सबक है। इसका मैं अनुसरण करना पसंद करूंगा। प्रियजनों के साथ रहिए। लेकिन, बोझ बनने की कीमत पर नहीं। रिटायर और बुजुर्ग लोगों को मेरी सलाह है कि वे जीवन में एक उद्देश्य की तलाश करें और अकेला महसूस न करें।