सेरेमिक और पैकेजिंग कारोबार पर जंग का क्या असर?
चैंबर ऑफ एसोसिएशन ऑफ महाराष्ट्र इंडस्ट्री एंड ट्रेड के अध्यक्ष दिपेन अग्रवाल बताते हैं, अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष का असर स्टील, सिरेमिक, ग्लास और प्लास्टिक उद्योग सहित उन सभी उद्योगों पर पड़ा है, जहां एलपीजी गैस का इस्तेमाल होता है। एलपीजी की आपूर्ति बाधित होने की वजह से इन सभी कारोबार की लागत बढ़ गई है। सिरेमिक और ग्लास उद्योग को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। जिसमें से 25 प्रतिशत सिरेमिक निर्यात किया जाता है। मौजूदा समय में गैस सप्लाई की कम उपल्ब्धता और विदेशी बाजार के लिए बढ़ी हुई लॉजिस्टिक लागत का सीधा असर उत्पादन पर पड़ रहा है। अगर यही स्थिति अगले दो से तीन हफ्ते तक बनी रहती हैं, तो इससे कंपनियों को लंबे समय के लिए बंद करना पड़ सकता है।
अग्रवाल कहते हैं, दुबई हमारे लिए निर्यात का बढ़ा केंद्र है, यहां से माल को अन्य खाड़ी देशों में सप्लाई किया जाता है। लेकिन युद्ध होने की वजह से सभी ऑर्डर रद्द हो चुके हैं। कच्चा माल भी इन्हीं रास्तों से देश में आता है, लेकिन होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने की वजह से सप्लाई नहीं है। एमसएमसई क्षेत्र इस तनाव की वजह से बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। प्लास्टिक , पैकेजिंग, केमिकल और कपड़े में उपयोग होने वाले पेट्रोकेमिकल जैसे कच्चे माल 20 प्रतिशत तक महंगे हो गए हैं। इससे कार्यशील पूंजी का दबाव बढ़ गया है, क्योंकि उच्च इनपुट लागत मार्जिन को कम करता है और कार्यशील पूंज वित्तपोषण की जरूरत को बढ़ाता है।
रुपये का जोर घटने से छोटे कारोबारी कैसे प्रभावित हो रहे?
वहीं दूसरी ओर भारत की तेल आयात पर अत्यधिक निर्भरता और रुपये के अवमूल्यन से छोटे व्यवसायों पर वित्तीय दबाव और बढ़ रहा है। इसके साथ ही कुछ निजि कंपनियों ने पेट्रोल (पांच प्रतिशत) और डीजल (तीन प्रतिशत) की कीमतों में वृद्धि कर दी है, जिसका असर उद्योग पर पड़ेगा। उनका कहना है, बावजूद इसके लोगों को पैनिक नहीं होना चाहिए। वर्तमान में आवश्यक चीजों की ही खरीदारी करें, जमाखोरी न करते हुए पब्लिक ट्रांस्पोर्टेशन का इस्तेमाल करते हुए हम पेट्रोल और डीजल की खपत को कम कर सकते हैं।
जंग जारी रही तो प्लास्टिक उत्पादों की कीमतों पर क्या असर पड़ेगा?
नवी मुंबई में पॉलिमर निर्माता राकेश जैन बताते हैं कि कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस से पॉलिमर से प्राप्त किया जाता है। पिछले कुछ समय से कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई है। जिसकी वजह से पॉलिमर की कीमतों में 50 से 60 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है। इसकी वजह हमारी मार्जिन पर दबाव पड़ रहा है। यदि यही स्थिति बनी रहती है, तो अगले महीने की शुरुआत से ही प्लास्टिक उत्पादों की कीमतों 50 से 60 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है। इसमें बोतल बंद पानी की कीमतें भी 2 से 3 रुपये तक बढ़ने की संभावना है।
क्या नमकीन और मिठाइयों की कीमतें भी युद्ध से प्रभावित होंगीं?
मेवा मसाला एसोसिएशन के अध्यक्ष योगेश गणत्रा कहते हैं, यह युद्ध कुछ लंबा चला तो आम आदमी के घर के बजट में 20 प्रतिशत तक की वृद्धि होने की संभावना है। कई क्षेत्रों पर इसका असर देखने को मिल रहा है। जिसमें खाद्य उद्योग जो कि पूरी तरह से एलपीजी गैस पर निर्भर करता है। इसकी आपूर्ति कम होने की वजह से नमकीन, मीठाई और मठरी बनाने की लागत 10 प्रतिशत तक बढ़ी है, साथ ही प्लास्टिक पैकेजिंग की लागत 25 प्रतिशत बढ़ने की वजह से 100 रुपये की नमकीन या मीठाई अब 135 रुपये तक बढ़ गई है।
सूखे मेवे की कीमतों में कितना उछाल आया है?
उन्होंने बताया कि खाड़ी देशों से भारत आयात होने वाले ड्राईफ्रूट या सूखे मेवे की कीमतों में वृद्धि हुई है, जिसमें खजूर 20 प्रतिशत, पिस्ता और बादाम 20 से 22 प्रतिशत और अंजीर के साथ केसर की कीमतें 20 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं। फिलहाल देश में चार महीने त्योहार और शादी ब्याह नहीं होने की वजह से इनकी मांग काफी कम है। इसलिए बाजार पर असर नहीं है। लेकिन अगस्त के महीने से त्योहारों की शुरुआत हो जाएगी, तब तक यह युद्ध नहीं रुका या देर से रुका तो भी इसका असर हमारी जेबों पर पड़ेगा।
किन उत्पादों की कीमत में राहत मिलने की उम्मीद?
गणत्रा बताते हैं कि वे चीजें जो कि सबसे अधिक खाड़ी देशों को निर्यात की जाती है, उनके दामों में गिरावट आई है, जैसे कि बासमती चावल 10 प्रतिशत तक घरेलू बाजार में सस्ता हो गया है। दूसरा आम जो सबसे अधिक निर्यात किया जाता है, वो इस बार घरेलू बाजार में सस्ता होगा। इसके साथ ही मीर्च को छोड़कर चाय, कॉफी, चीनी, और नारियल की गिरी, इलायची, हल्दी, जीरा, धनिया घरेलू बाजार में सस्ते होने की संभावना है।
उद्योग की परेशानी दूर करने के लिए सरकार क्या कर रही है?
जानकारों का कहना उद्योगों की परेशानी दूर करते हुए, केंद्र सरकार ने राज्यों को वाणिज्यक एलपीजी का आवंटन 20 प्रतिशत तक बढ़ाकर युद्ध से पहले की मांग का 70 प्रतिशत कर दिया है। जिसमें इस्पात, ऑटोमोबाइल, कपड़ा, रंगाई, केमिकल और प्लास्टिक जैसे उद्योगों की परेशानी को कम करने और इन उद्योगों की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। लेकिन देखना यह होगा कि कच्चे माल की आपूर्ति और आयात-निर्यात के व्यवधान उद्योग पर कितना असर डालेंगे।