बॉम्बे हाईकोर्ट ने 50 किलोग्राम गांजा रखने के आरोप में गिरफ्तार 22 वर्षीय एक व्यक्ति को जमानत दे दी और कहा कि मुंबई पुलिस का मादक पदार्थ रोधी प्रकोष्ठ (एएनसी) कानूनी रूप से अनिवार्य तलाशी और जब्ती प्रक्रिया का पालन करने में विफल रहा है। जिससे वसूली संदिग्ध हो गई।
न्यायमूर्ति अनुजा प्रभुदेसाई की एकल पीठ ने 15 सितंबर को शिवराज सतपुते को जमानत दे दी, जिन्हें एएनसी ने 6 जुलाई, 2021 को अहमदनगर स्थित उनके आवास पर गिरफ्तार किया था, जहां से उन्होंने 50 किलोग्राम गांजा भी जब्त किया था। आरोपी ने जमानत की मांग करते हुए दावा किया कि उसके आवास पर तलाशी सूर्यास्त और सूर्योदय के बीच ली गई थी और जब्ती और नमूने की अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था, जो प्रथम दृष्टया जब्ती को अवैध बनाता है।
अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि मामले में सह-आरोपी की ओर से दिए गए बयान के आधार पर आरोपी के आवास पर तलाशी ली गई और इसलिए यह एक मौके पर हुई रिकवरी है। पीठ ने अपने आदेश में कहा कि नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (एनडीपीएस) अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, एक अधिकारी बिना किसी वारंट या प्राधिकरण के सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच तलाशी ले सकता है। ऐसी स्थिति में वारंट आवश्यक होगा जब तक कि अधिकारी के पास यह मानने का कारण न हो कि अपराधी को भागने का अवसर दिए बिना तलाशी वारंट या प्राधिकरण प्राप्त नहीं किया जा सकता है।
अदालत ने कहा कि मौजूदा मामले में गिरफ्तार आरोपी के घर की तलाशी ली गई और बिना किसी वारंट या प्राधिकार के सूर्यास्त और सूर्योदय के बीच कथित तौर पर गांजा जब्त किया गया। अदालत ने अभियोजन पक्ष की इस दलील को भी स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि यह संयोग से हुई वसूली थी और कहा कि सह-आरोपी जिसके बयान पर सतपुते के घर की तलाशी ली गई थी, उसे पांच दिन पहले गिरफ्तार किया गया था। अदालत ने कहा, 'इसलिए, प्रथम दृष्टया यह जांच के सामान्य क्रम में मौके से बरामदगी या जब्ती का मामला नहीं था, बल्कि यह सह-आरोपी द्वारा दी गई विशिष्ट जानकारी के आधार पर हुआ। इसमें कहा गया है कि तलाशी और जब्ती, जो एनडीपीएस अधिनियम की धारा 42 के अनिवार्य प्रावधानों का उल्लंघन है, प्रथम दृष्टया बरामदगी को संदिग्ध बनाती है।
पीठ ने आगे कहा कि आरोपी 22 साल का एक युवक है, जो पिछले दो साल से हिरासत में है, उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और मामले में सुनवाई उचित समय के भीतर समाप्त होने की संभावना नहीं है। अदालत ने सतपुते को 50,000 रुपये के मुचलके पर जमानत देते हुए कहा, ''उच्चतम न्यायालय ने बार-बार कहा है कि लंबे समय तक हिरासत में रखना भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।