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Experts' Opinion: विरोधाभास खत्म कर कृषि शोध बढ़ाने की जरूरत; योजनाएं तो अच्छीं, पर पैसा भी जरूरी

Wed, 24 Jul 2024 06:50 AM IST
मेघा झा डॉ. अशोक गुलाटी, प्रो. अरुण कुमार

सार

सवाल यह है कि इस खेती के लिए पैसा कितना खर्च किया जा रहा है? जबकि, केमिकल फर्टिलाइजर्स पर 1 लाख 60 हजार करोड़ से ऊपर सब्सिडी दी जाती है।
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किसान प्रतीकात्मक - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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यह अच्छी बात है कि सरकार भी मान रही है कि हमारी खेती जलवायु के प्रति लचीली नहीं है, लेकिन यह कहानी सिर्फ कहने से पूरी नहीं होती। यह निर्भर करता है कि इस पर पैसा कितना खर्च किया जाता है। इसके लिए प्राकृतिक खेती पर जोर दिया जा रहा है और इससे एक करोड़ किसानों को इससे जोड़ने की बात कही जा रही है। पर यह स्पष्ट नहीं है कि इससे पर्याप्त कृषि उत्पादकता मिल सकेगी या फिर नहीं।
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1960 से पहले हमारे यहां प्राकृतिक खेती ही होती थी। फर्टिलाइजर्स का उपयोग इसीलिए किया गया, क्योंकि प्राकृतिक खेती से अच्छी उत्पादकता मिलनी कठिन होती है। सवाल यह है कि इस खेती के लिए पैसा कितना खर्च किया जा रहा है? जबकि, केमिकल फर्टिलाइजर्स पर 1 लाख 60 हजार करोड़ से ऊपर सब्सिडी दी जाती है। यह कृषि मंत्रालय के बजट से भी ज्यादा है। खेती में जब इन फर्टिलाइजर्स का उपयोग करते हैं तो पौधे 35-40 फीसदी से अधिक अवशोषित नहीं करते और इसके अवशेष पर्यावरण में जाकर ग्रीनहाउस गैस बनाते हैं। फर्टिलाइजर सब्सिडी कृषि से संबंधित बजट का प्रमुख आइटम है। इसके उपयोग से लेकर रिटर्न से कई विसंगतियां जुड़ी हैं।

दोगुना हो बजट
बडे़ पैमाने पर दी जाने वाली फर्टिलाइजर सब्सिडी के मुकाबले नेचुरल फार्मिंग को दो हजार करोड़ भी नहीं दिया जा रहा। इसीलिए, एक विरोधाभास है। जलवायु के प्रति लचीली खेती को बढ़ावा देने का सबसे अच्छा तरीका कृषि अनुसंधान को बढ़ावा देना है। जलवायु के खतरों से खेती को बचाने के लिए कृषि अनुसंधान एवं विकास का बजट कम से कम दोगुना करना चाहिए था। इसमें सिर्फ 0.7 फीसदी वृद्धि की गई है।
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योजनाएं तो अच्छीं, पर पैसा भी जरूरी
वहीं, अर्थशास्त्री व जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर प्रो. अरुण कुमार कहते हैं कि भारत विकसित तभी हो सकता है जब गांव और किसान समृद्ध होंगे। खेती में आसानी होगी और आय बढ़ेगी। सरकार ने इस ओर कदम बढ़ाया है। कई योजनाओं की घोषणा की गई हैं, जिनमें जलवायु अनुकूल फसलों की किस्में लाने और बेहतर बाजार का वादा प्रमुख है। ग्रामीण विकास के लिए जितना बजट में पैसा रखा गया है वह कम है। इसे और बढ़ाने की जरूरत है। इसके लिए कैपिटल इंसेंटिव सेक्टर यानी जैसे रेलवे फ्रेट कॉरिडोर या ऐसे प्रोजेक्ट जहां मशीनों से ज्यादा काम लिया जा रहा है, वहां बजट कम करके कृषि क्षेत्र का बजट बढ़ाया जा सकता है। इस बार के बजट में की गईं घोषणाएं अगर जमीन पर उतरीं तो गांव और किसान की किस्मत चमकेगी। विकसित भारत का लक्ष्य पूरा करने के लिए सरकार ने गांवों को इसलिए आधार बनाया है, क्योंकि यहां 46 फीसदी लोग काम करते हैं, 60 फीसदी लोग कृषि पर निर्भर हैं।
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