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खास बातचीत: बाजार में बिकने वाला हर 7वां स्कूटर आज ई-स्कूटर, तीन साल बाद हिस्सेदारी 50 फीसदी होगी

Mon, 17 Oct 2022 06:06 AM IST
देव कश्यप अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।

सार

एथर एनर्जी के चीफ बिजनेस ऑफिसर रवनीत फोकेला से भारत में ई-स्कूटर के भविष्य समेत अन्य पहलुओं पर अमर उजाला के संजय अभिज्ञान से हुई खास बातचीत के अंश...
 
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एथर एनर्जी के चीफ बिजनेस ऑफिसर रवनीत फोकेला। - फोटो : Ather Energy
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विस्तार
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अगस्त-सितंबर के दौरान देश के वाहन बाजार में ई-स्कूटर की मांग उम्मीद से ज्यादा रही। तीन साल बाद ही देश में बिकने वाले कुल स्कूटरों में ई-स्कूटरों की हिस्सेदारी 50 फीसदी होगी। ई-स्कूटर अपनी किफायत या शून्य प्रदूषण जैसे गुणों से ज्यादा, अपने शानदार तकनीकी फीचरों के कारण उपभोक्ताओं के दिल में उतर रहा है। ई-स्कूटर की आदर्श रेंज 90 किलोमीटर है। इससे ज्यादा रेंज के चक्कर में उपभोक्ताओं की ओर से ज्यादा कीमत चुकाने में कोई समझदारी नहीं है। 

  • तीन साल बाद देश में बिकने वाला हर दूसरा स्कूटर ई-स्कूटर होगा। मौजूदा त्यौहारी सीजन में ई-स्कूटर बाजार में मांग उम्मीद से ज्यादा है।
  • कंपनी का लक्ष्य दो साल में उत्पादन क्षमता 1.20 लाख स्कूटर प्रतिवर्ष से बढ़ाकर 14 लाख करना है।

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आज अगर कोई स्कूटर खरीदना चाहता है तो वह ई-स्कूटर ही क्यों खरीदे?
सबसे पहली चीज है...शानदार टेक्नॉलाजिकल अनुभव। अमूमन, लोगों को लगता है कि ई-स्कूटर इसलिए खरीदना चाहिए क्योंकि उसे चलाने की लागत पेट्रोल मॉडल के मुकाबले बहुत कम होती है। बहुत से लोग इसलिए भी ई-स्कूटर के हक में फैसला लेते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसा कर वे पर्यावरण को बचाएंगे। दोनों बातें गलत नहीं हैं। लेकिन, किफायत और शून्य प्रदूषण ई-स्कूटर खरीदने की पहली वजह नहीं होनी चाहिए। सबसे बड़ी और पहली वजह यही होनी चाहिए कि ई-स्कूटर आपको भविष्य का वाहन चलाने का अनुभव देता है। टचस्क्रीन, जीपीएस, एक्सलेरेशन, कंफर्ट सब कुछ एक शानदार तकनीकी अपग्रेड की फीलिंग देता है। तेल से चलने वाले स्कूटर से ई-स्कूटर की ओर जाना ऐसा ही है, जैसा पुराने फीचर फोन से स्मार्टफोन की ओर जाना।

लेकिन, ई-स्कूटर का दाम भी तो ज्यादा है?
देखिए, अगर मिलने वाले फायदों के आईने से देखेंगे तो ई-स्कूटर आपको सस्ता ही पड़ता है। सबसे पहले तो यह समझिए कि पेट्रोल स्कूटर चलाने की लागत जहां 2.25 रुपये प्रति किलोमीटर तक आती है, वहीं ई-स्कूटर आपको औसतन 30 पैसे प्रति किलोमीटर की लागत देता है। इससे कीमत का फर्क तो आपका कुछ महीनों में निकल आता है। लेकिन, आपॅरेशन की किफायत से कहीं ज्यादा आकर्षक बात है कि तकनीकी अपग्रेडेशन। इसके लिए ही आज उपभोक्ता ई-स्कूटर की तरफ जा रहे हैं। अगर अगस्त में बाजार में हर 100 में 15 स्कूटर बैटरी वाले बिके तो इसकी वजह यही है कि लोग समझ रहे हैं कि आज जो महंगा दिख रहा है, वह आगे जाकर बहुत सस्ता पड़ने वाला है।
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मतलब उपभोक्ता को कीमत का अंतर चुभता नहीं?
नहीं। आपको बताना चाहू्ंगा कि आज एथर के दो ई-स्कूटर मॉडल बाजार में हैं। महंगा वाला मॉडल दूसरे से 15 से 20 हजार रुपये महंगा है। लेकिन, आपको अचरज होगा कि हमारी 85 फीसदी बिक्री महंगे वाले मॉडल की होती है। मतलब, उपभोक्ता ज्यादा फीचर के लिए अधिक कीमत देने के लिए राजी है। दरअसल, उपभोक्ता सोचता है कि जब नए जमाने की चीज ले रहे हैं तो फिर बीच में क्या रुकना? फिर तो पूरी तरह आगे जाएंगे तो आधुनिकतम फीचर वाली चीज ही खरीदेंगे। मतलब, ई-स्कूटर बाजार में साधारण या पारंपरिक तर्क नहीं चलता।

और यह सर्टिफाइड रेंज और ट्रू रेंज का चक्कर क्या है?
सर्टिफाइड रेंज का प्रमाणपत्र तो एआरआई सरीखी एजेंसी से मिलता है। इसका मतलब है कि आदर्श परिस्थितियों में स्कूटर एक बार चार्ज होने के बाद कितनी दूर तक जाता है। दूसरी ओर, ट्रू रेंज का अर्थ है कि प्रैक्टिकल लाइफ में वास्तविक हालात में मिलने वाली रेंज। अगर वाहन पहाड़ी क्षेत्र में चल रहा है या बहुत ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर तो ट्रू रेंज सर्टिफाइड रेंज से काफी कम बैठेगी। काफी कुछ ड्राइविंग स्टाइल पर भी निर्भर करता है। 

ज्यादा उतार-चढ़ाव के साथ झटके देकर चलाना, वाहन को गलत तरीके से चलाना, रखरखाव में कमी...ऐसे कई फैक्टर भी ट्रू रेंज को कम कर देते हैं। बहरहाल, एथर के स्कूटर में हम 105 किमी की ट्रू रेंज का वादा करते हैं।

क्या ई-वाहन में आग लगने का खतरा ज्यादा होता है? एथर के ई-स्कूटर कितने सुरक्षित हैं?
ई-वाहन पेट्रोल वाहनों जितने ही सुरक्षित हैं। आग लगने का संबंध न तो गर्म मौसम से है और न ही मैन्युफैक्चरिंग से। इसका संबंध बैटरी के डिजाइन और वाहन की गुणवत्ता से है। आयातित बैटरी के साथ ऐसे हादसों की आशंका ज्यादा है। आयातित बैटरी विदेश की सड़कों के हिसाब से बनाई जाती हैं। भारत की सड़कों की गुणवत्ता उतनी उम्दा नहीं है। यहां गड्ढे भी हैं और ड्राइव करने के तौर-तरीके भी अलग हैं। ऐसे में बैटरी की डिजाइन भारत के हिसाब से ही होनी चाहिए। सारी स्कूटर कंपनियां गुणवत्ता को लेकर पर्याप्त जागरूक नहीं होतीं। शुक्र है कि एथर के किसी स्कूटर में आग लगने की घटना सामने नहीं आई। इसकी वजह है। हमने स्कूटर बाद में बनाया और बैटरी पहले बनाई।  

इसके लिए आप अपने रिसर्च और डेवलपमेंट पर कितना खर्च करते हैं?
यूं समझ लीजिए कि आज तक कंपनी ने अगर 27 करोड़ डॉलर की निवेश राशि जुटाई है तो उसमें आधी रिसर्च और डेवलपमेंट पर खर्च हुई। हमारा पूरा स्कूटर खुद का डिजाइन किया हुआ है। हमने विदेशी पुर्जो के हिसाब से खुद को नहीं ढाला। अपने खुद के पुर्जे डेवलप किए। आठ साल से हम बैटरी पर काम कर रहे हैं। अपनी बैटरी खुद बनाते हैं। देखिए, बैटरी डिजाइन या सुरक्षा के फीचर विकसित करने प्रक्रिया आप फास्ट फारवर्ड नहीं कर सकते। उसमें अगर पांच साल लगते हैं तो पांच साल आपको देने ही होंगे। इसलिए, हमें रिसर्च के अपने लंबे अनुभव का भरपूर फायदा मिला है। उपभोक्ता तो ई-स्कूटर के लिए तैयार है। 

  • सिस्टम ई-वाहनों के लिए कितना तैयार है? क्या चार्जिंग का सार्वजनिक ढांचा पर्याप्त है? हाइवे पर पर्याप्त ढांचा नहीं है। इससे ई-स्कूटर के मुकाबले ई-कारों को ज्यादा दिक्कत हो सकती है। ई-स्कूटर के लिए तो फिर भी शहरों में काफी प्रयास नजर आ रहे हैं।
  • क्या बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए उत्पादन क्षमता भी इतनी तेजी से बढे़गी?
  • हमारी उत्पादन क्षमता सालाना 1.20 लाख स्कूटर की है। हम नए उत्पादन संयंत्र के लिए चार-पांच राज्यों से बात कर रहे हैं। दो साल बाद हमारा लक्ष्य क्षमता को बढ़ाकर 14 लाख करना है। 2025 तक घरेलू बाजार में बिकने वाले कुल स्कूटरों में 50 फीसदी ई-स्कूटर होंगे। पब्लिक ट्रांसपोर्ट के वाहनों में तो पहले ही आधे से ज्यादा बैटरी वाले हो गए हैं। भविष्य को देखते हुए हम उत्पादन क्षमता बढ़ा रहे हैं। 


ई-स्कूटर की आदर्श रेंज क्या होनी चाहिए?
रेंज का अर्थ है एक बार चार्ज होने के बाद ई-स्कूटर कितने किलोमीटर का सफर तय कर सकता है। बदकिस्मती से रेंज को लेकर बाजार में खरीदार अभी भ्रमित हैं। वे दिमाग की बजाय दिल से काम ले रहे हैं। यह इमोशनल मामला बन गया है, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। समझना होगा कि ज्यादा रेंज ज्यादा पॉवर वाली बैटरी से आती है। ज्यादा पावर वाली बैटरी का मतलब है ज्यादा कीमत। ई-स्कूटर की आधी कीमत तो बैटरी की ही होती है। मतलब ज्यादा रेंज के चक्कर में लोग 20 से 50 हजार रुपये तक फालतू देने को तैयार हो जाते हैं। 

  • मगर, सवाल यह है कि ज्यादा रेंज आपको चाहिए क्यों? क्या यह प्रैक्टिकल उम्मीद है? हमारी रिसर्च के हिसाब से एक औसत शहरी एक दिन में 25 से 30 किलोमीटर ही स्कूटर चलाता है। ऐसे में अगर वह 80 या 90 किलोमीटर रेंज वाला ई-स्कूटर खरीदता है तो इसका मतलब है कि तीन-चार दिन बिना दोबारा चार्जिंग के वह चल सकता है।
  • अब अगर वह 150 किलोमीटर रेंज वाला स्कूटर खरीदने पर अड़ जाए और उसके लिए 50 हजार फालतू खर्चने को राजी हो जाए तो उसका फायदा क्या? वास्तव में 80 से 90 की रेंज ही आदर्श रेंज है।


क्या उद्योग को केंद्र सरकार से पर्याप्त मदद मिल रही है?
बिलकुल मिल रही है। फेम-2 स्कीम के तहत केंद्र सरकार की अच्छी सब्सिडी है। फिर दिल्ली, कर्नाटक, महाराष्ट्र जैसे राज्य टॉप-अप सब्सिडी भी दे रहे हैं। कई राज्यों में रोड टैक्स और पंजीकरण शुल्क आदि में अच्छी रियायत मिल रही है। निर्माण के स्तर पर भी रियायती स्कीमें हैं। जीएसटी में भी छूट मिल रही है। 

जो राज्य केंद्र की सब्सिडी के समांतर अपनी सब्सिडी अभी नहीं दे रहे, वे भी आगे जाकर अपने नागरिकों को छूट दे ही देंगे, ऐसी मुझे उम्मीद है। ये सब उम्मीद से ज्यादा ही हैं। अब उद्योग को अपने वादे निभाने हैं। सरकार की सब्सिडी की शर्तों के मुताबिक उत्पादन प्रक्रिया का स्थानीयकरण करना है। आयातित पुर्जों पर निर्भरता न्यूनतम करनी है।

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