किसी मामले में महिला के लिए क्रूरता पुरुष के लिए भी क्रूरता हो यह जरूरी नहीं है और जब अदालत किसी ऐसे मामले की जांच करती है जिसमें पत्नी तलाक चाहती है तो उन मामलों में अपेक्षाकृत अधिक लोचनीय और व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होती है।
पीठ ने बुधवार को फैसला सुनाते हुए अलग रह रही पत्नी की ओर से पेश हुए वकील दुष्यंत पराशर की इस दलील पर गौर किया कि उसने क्रूरता के आधार पर तलाक मांगा है और दावा किया है कि उसके पति ने उसके चरित्र पर आक्षेप लगाया है।
पराशर ने दलील दी कि उच्च न्यायालय और निचली अदालत दोनों ने तलाक देने से इनकार करके गलती की है। पीठ ने कहा कि मामले के तथ्य खुद ही बोलते हैं। दोनों ने साल 2002 में शादी की थी। उनके बच्चे के जन्म के बाद से वैवाहिक जीवन में खटास पड़नी शुरू हुई। दोनों पक्षों के बीच 2006 से विवाद शुरू हो गया था। "अपीलकर्ता-पत्नी ने भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 498ए और दहेज निषेध अधिनियम, 1961 की धारा 3 और 4 के तहत शिकायत दर्ज की। प्रतिवादी-पति ने अपीलकर्ता-पत्नी के चरित्र पर सवाल उठाया था।
पीठ ने कहा कि पति ने दावा किया कि उसकी पत्नी ने ससुराल छोड़ दिया था और पत्नी की चिकित्सकीय जांच की भी मांग करते हुए आरोप लगाया कि वह व्यभिचार में रह रही है और सहवास नहीं करने की अवधि के दौरान उसने एक बच्चे को जन्म दिया था। पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय ने अनुरोध खारिज कर दिया था और दंपति डेढ़ दशक से अलग रह रहे हैं।