आर्थिक सुस्ती का असर सीमेंट उद्योग पर भी हुआ है और इस वर्ष अप्रैल से मांग में कमी की समस्यायें आ रही है जिसके कारण अभी सीमेंट कंपनियां अपनी पूरी क्षमता से परिचालन नहीं कर पा रही हैं। प्लास्टिक कचरे की परेशानी से निजात दिलाने के लिए सीमेंट उद्योग आगे आया है। देश के सीमेंट उत्पादकों ने सरकार के साथ मिलकर तय किया है कि अब वह अपनी भट्ठियों में प्लास्टिक कचरे से बने ईंधन का इस्तेमाल करेंगे। इससे जहां देश के करीब 50 फीसदी प्लास्टिक के कचरे का निपटान हो सकेगा, वहीं कोयले पर आयात बिल भी घटेगा और विदेशी मुद्रा की भी बचत होगी।
सीएमए का कहना है कि सीमेंट कारखाने की भट्ठी में प्लास्टिक कचरे से बने ईंधन का इस्तेमाल करने से तिहरा लाभ होगा। इससे गांव-शहर प्लास्टिक कचरे से मुक्त होंगे और इसे बीनने और साफ करने में काफी लोगों को रोजगार भी मिलेगा जबकि कोयले का आयात घटने से जो विदेशी मुद्रा बचेगी उसका उपयोग अन्य चीजों के आयात में हो सकेगा। पर्यावरण सचिव ने सीमेंट उद्योग को एक तरह से चेतावनी देते हुए कहा कि सिर्फ बोलने भर से कुछ नहीं होगा, इस दिशा में काम भी करना होगा। सीमेंट उद्योग ने एक साल पहले भी वादा किया था कि वह कम से कम 25 फीसदी वैकल्पिक ईंधन का इस्तेमाल करेंगे, लेकिन अभी पांच फीसदी के स्तर तक भी नहीं पहुंच सके हैं।
महेन्द्र सिंघी ने कहा कि अभी देश की सीमेंट कंपनियां अपनी स्थापित क्षमता का 70 फीसदी ही उपयोग कर पा रही है। मांग में कमी के कारण 30 फीसदी क्षमता का उपयोग नहीं कर पा रही है क्योंकि यह पूरी तरह से मांग आधारित उद्योग है, मांग आने पर उत्पादन तत्काल शुरू हो जाता है।
उन्होंने कहा कि उनके संगठन ने सीमेंट पर पर जीएसटी को 28 फीसदी से कम कर 18 फीसदी करने की मांग नहीं की है लेकिन यह सरकार पर है कि वह इस संबंध में कब निर्णय लेती है। उनका संगठन सरकार के साथ है। उन्होंने कहा कि अभी देश में सीमेंट पूरी दुनिया से लगभग सस्ती है क्योंकि छह रुपये प्रति किलो यह बिक रहा है। इसमें 28 फीसदी जीएसटी भी जुड़ा हुआ है।