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शिखर का सफर: आसान नहीं, कठिन राह चुनने से मिली सफलता, पढ़ें सोनालीका ट्रैक्टर की कामयाबी की कहानी

Tue, 11 Jul 2023 09:15 PM IST
Jeet Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सोनालीका आज ट्रैक्टरों की दुनिया का जाना-माना नाम है। देश के ट्रैक्टर बाजार में यह तीसरे नंबर पर है। हालांकि अपने इस ब्रांड को इस मुकाम तक पहुंचाने में इंटरनेशनल ट्रैक्टर्स लि. को कई उतार चढ़ाव का सामना करना पड़ा।
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Mr. Raman Mittal, Joint Managing Director, Sonalika - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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सोनालीका आज ट्रैक्टरों की दुनिया का जाना-माना नाम है। देश के ट्रैक्टर बाजार में यह तीसरे नंबर पर है। हालांकि अपने इस ब्रांड को इस मुकाम तक पहुंचाने में इंटरनेशनल ट्रैक्टर्स लि. को कई उतार चढ़ाव का सामना करना पड़ा। वहीं कृषि क्षेत्र के उतार-चढ़ाव और इंटरनेशनल ट्रैक्टर्स लि. की सफलता पर ज्वाइंट मैनेजिंग डायरेक्टर रमन मित्तल ने बात की।

  • कृषि उपकरण बनाने वाली पंजाब की यह कंपनी जब 1995 में ट्रैक्टर निर्माण के क्षेत्र में उतरी तो न अनुभव था और न ही संसाधन। मगर तीस साल से कम समय में कंपनी ने सफलता की बुलंदियां छू लीं।
  • कंपनी की स्थापना लक्ष्मण दास मित्तल ने की थी लेकिन इसकी वर्तमान सफलता में ज्वाइंट मैनेजिंग डायरेक्टर रमन मित्तल का बहुत बड़ा योगदान है। कंपनी और ट्रैक्टर इंडस्ट्री के सफर, चुनौतियों, लक्ष्य और उम्मीदों के बारे में उन्होंने सुमन कुमार से विस्तार से बातचीत की....

लोग कहते हैं दो मिनट में मैगी बनती है,  लेकिन सोनालीका के होशियारपुर संयंत्र में हर दो मिनट में एक ट्रैक्टर बनता है।

सवाल- ट्रैक्टर्स की दुनिया में सोनालीका परिचय की मोहताज नहीं है। कामयाबी के सफर के बारे में कुछ बताएं।

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जवाब-
पहले हम सिर्फ थ्रेसर बनाते थे, जिन्हें खरीदने के लिए लाइन लगती थी। 1995 में सोनालीका परिवार ने यह तय किया कि हम ट्रैक्टर निर्माण के क्षेत्र में उतरेंगे। इसकी प्रेरणा किसान भाइयों ने ही दी। उन्होंने कहा कि आप थ्रेसर इतना अच्छा बनाते हैं, ट्रैक्टर भी बनाइये, क्योंकि हमें अच्छा ट्रैक्टर नहीं मिलता। उसी समय भारत में दो बड़ी विदेशी कंपनियां ट्रैक्टर के क्षेत्र में आईं थीं। उनके पास संसाधन, पैसा, ज्ञान, जमीन सभी कुछ था। दूसरी ओर हमारी सोच यह थी कि हमें कर्ज लेकर कारोबार नहीं करना है। हमने आसान नहीं बल्कि कठिन रास्ता चुना। सोनालीका पंजाब के होशियारपुर की एक कंपनी है। हम जिस दौर की बात कर रहे हैं उस दौर में बड़ी कंपनियां दिल्ली, फरीदाबाद वगैरह में थीं। तब हम किसी से मिलते थे तो वो सभी कहते थे आप गलती कर रहे हैं।

  • आज 30 साल से कम समय में सोनालीका दुनिया में ट्रैक्टर निर्यात का सबसे बड़ा ब्रांड है। पूरी दुनिया में ट्रैक्टर उत्पाद का सबसे बड़ा संयंत्र छोटे से होशियारपुर में है। लोग कहते हैं दो मिनट में मैगी बनती है, लेकिन सोनालीका के इस संयंत्र में हर दो मिनट में एक ट्रैक्टर बनता है।

सवाल- कोविड से हर उद्योग को झटका लगा। आप कैसे उबरे...अब क्या हालात हैं?
जवाब- कोविड बड़ा कठिन समय था... तब हर कंपनी और कारोबारी को अपनी असलियत, डीएनए तलाशना पड़ा था। हमें यह तक नहीं पता था कि लॉकडॉउन में बैंकिंग सिस्टम कैसे काम करेगा। ऐसे में हम ऐसी कंपनी थे जिन्होंने अपने कर्मचारियों के वेतन का अग्रिम भुगतान किया था।

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हमारा संयंत्र भी एक महीना बंद रहा...  हमने किसी को नौकरी से नहीं निकाला। यहां तक कि कोविड से पहले कुछ लोग इस्तीफा दे चुके थे लेकिन कोविड के कारण नई कंपनी ने उन्हें रखने से मना कर दिया तो हमने उन्हें भी दो महीने अपने साथ और रहने दिया।
कठिनाई के समय ही कंपनी की असलियत दिखती है...हमें पता था कि स्थिति जल्द बदलेगी। इस समय हम लोगों का साथ नहीं छोड़ सकते। मुझे खुशी है कि तब हमने कंपनी को एक परिवार की तरह चलाया।

सवाल- कंपनी की ग्रोथ के बारे में कुछ बताएं?
जवाब- 
12 साल पहले हम सालाना 40 हजार ट्रैक्टर बेचने लगे थे। इसके बाद एक लाख ट्रैक्टर बिक्री का तय कर हमने अगले ही साल 700 करोड़ की लागत से प्लांट लगाया। आप सोचें, ऐसी कंपनी जिसने पिछले साल सिर्फ 40 हजार ट्रैक्टर बेचे हों, वो एक ऐसा लक्ष्य तय कर अपनी जेब से 600 या 700 करोड़ का निवेश कर दे जो पिछले लक्ष्य से कहीं आगे है तो क्या होगा। मेरा मानना है कि आपके सपनों पर आप खुद भरोसा नहीं करेंगे तो दूसरा क्यों करेगा। सपनों की ताकत देखिये कि एक लाख का लक्ष्य हमने 2018 में ही हासिल कर लिया। अब तो हम डेढ़ लाख ट्रैक्टर्स हर साल बेच रहे हैं। हमने एक और नया प्लांट लगाया है।

-मेरी फिलॉसफी आसान हैं। हम जब कोई काम करते हैं तो हमें पता नहीं होता कि क्या कठिनाइयां आएंगी। नए लक्ष्य तय करें और उसे हासिल करें। फिर नए लक्ष्य बनाएं। इस तरह कठिनाइयां दूर होती जाती हैं और लक्ष्य हासिल होता जाता है।

सवाल- कंपनी की इस सफलता के पीछे राज क्या है?
जवाब- सोनालीका के लिए नंबर की सोच अलग होती है। हमने हर साल महीने दर महीने पहले से बेहतर प्रदर्शन किया है।

  • हमें दो सोच बनानी है। एक, हर दिन, हर महीने पहले से बेहतर करना है। दूसरी, जो चीज बड़े नंबर देगी उसके लिए मेहनत में कोई कमी न छोड़ना। इसके तहत नए प्लांट, आर एंड डी, चैनल पार्टनर्स को साथ में जोड़े रखना, लोगों में निवेश करना जैसी चीजें हैं।
  • हमारे डीलर्स की संख्या आज भी पहले जैसी ही है। उन्हीं के साथ हम एक लाख ट्रैक्टर्स बेच रहे थे और अब दो लाख बेचने की तैयारी में हैं। आज हमारी कंपनी जितनी सफल है हमारे डीलर भी उतने ही सफल हैं।

सवाल- 2030 के लिए लक्ष्य
जवाब- हमारा लक्ष्य स्पष्ट है। जब हमने पहला ट्रैक्टर बनाया था तभी ये लक्ष्य तय था कि हमें नंबर एक बनना है। हम इसकी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। हमने अभी हाल ही में एक और फैक्टरी भी शुरू की है। हमारी सोच सीधी है, हमें अच्छा ट्रैक्टर बेचना है, बेहतर कीमत पर बेचना है। किसान अगर खुश होंगे, डीलर खुश होंगे तो दो लाख तीन लाख या पांच लाख के नंबर उसके सामने कुछ नहीं हैं।

सवाल- बड़ी कंपनियां नए-नए मॉडल उतार रही हैं। उनके पास संसाधन भी है और आर एंड डी भी मजबूत है। इस पर क्या रणनीति है?
जवाब-
दुनिया की बड़ी कंपनियां, जिनके पास सौ साल का अनुभव और टेक्नोलॉजी है, उनसे मुकाबला करने के लिए हमारी सोच बेहद सीधी है। हम सिर्फ अपने किसान भाई और उसकी मिट्टी की जरूरत के हिसाब से ट्रैक्टर बनाते हैं। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र और पंजाब की मिट्टी में बहुत फर्क है।

पंजाब का किसान कहता है कि हमें तो ट्रैक्टर की रफ्तार कुछ धीमी चाहिए, जबकि महाराष्ट्र वाले को तेज, वैसे ही राजस्थान में हाइड्रोलिक अलग चाहिए जबकि तमिलनाडु के किसानों की अपनी जरूरत अलग है।

टायर, रबड़ या बैटरी जैसी कुछ चीजों को छोड़ दें तो आज सोनालीका इकलौती ऐसी कंपनी है जो अपना इंजन, ट्रांसमिशन, अपना हाइड्रोलिक सिस्टम, शीट मेटल, प्लास्टिक सब खुद बनाती है। हमारे पास दो हजार से अधिक मॉडल हैं। हम इतनी जटिलता को मैनेज कर रहे हैं। आज अगर मैं चाहूं कि नए इंजन के साथ ट्रैक्टर उतारना है तो एक साल में ऐसा कर सकता हूं।

रमन मित्तल बोले- आप किसी भी चीज की गारंटी दे सकते हैं जीवन की नहीं दे सकते। इसलिए मैं हर दिन को एंजॉय करता हूं। मुझे रात की नींद अच्छी आती है क्योंकि मैं दिन में अच्छा काम करता हूं।

सवाल- सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
जवाब-
पहले किसान भाइयों को मुश्किल से कर्ज मिलता था। अब एनबीएफसी कंपनियों के कृषि क्षेत्र में आने से यह समस्या दूर हो गई है। इसके बावजूद ट्रैक्टर खरीदना किसानों के लिए आज भी आसान नहीं है। ट्रैक्टर की कीमत को लेकर भी पारदर्शिता नहीं है। हमने अपने सभी ब्रांड की कीमत वेबसाइट पर दी हुई है। दूसरी कंपनियाें ने अब तक ऐसा नहीं किया है।

सवाल- किसानों को फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलना ट्रैक्टर इंडस्टी के लिए कितना लाभदायक होगा?
जवाब-
इसे सिर्फ ट्रैक्टर इंडस्ट्री से जोड़कर क्यों देखें? यदि किसान के हाथ में पैसा होगा तो वह बेहतर घर बनाएगा, बच्चों को बेहतर शिक्षा देगा, ट्रैक्टर के साथ-साथ दूसरी गाड़ी भी खरीदेगा। बीमारी का सही से इलाज करा पाएगा। यह तो पूरी तरह समाज के एक पूरे तबके की उन्नति से जुड़ा सवाल है।

सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं है...अपने आइडिया पर खुद मेहनत करनी होगी

युवा उद्यमियों से यही कहना चाहूंगा कि दोस्तों उधार की जिंदगी नहीं जीनी चाहिए। हम देखते हैं कि युवाओं के दिमाग में कोई आइडिया है और उन्हें लगता है कि वो बस इस आइडिया को बेचकर सफल हो सकते हैं।
-हालांकि, 100 में 99 लोगों को इसके लिए फंड नहीं मिल पाता। उन्हें समझना होगा कि अपने आइडिया पर उन्हें खुद मेहनत करनी होगी। इन 99 लोगों को तो सोनालीका की तरह हर दिन कठिनाई झेलकर ही अपने लिए सफलता की राह बनानी होगी। सफलता का और कोई शॉर्टकट नहीं है।

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