गर्मियों के मौसम में अमेरिका के सोनोरन रेगिस्तान में नदियां और नाले सूखने लगते हैं। इसकी वजह से यहां पर पानी की कमी हो जाती है, जिससे निपटने के लिए जंगली घोड़े और गधे अनोखा तरीका अपनाते हैं। वे पानी की तलाश में जमीन खोदकर कुएं बना डालते हैं। यह सुनकर भले ही आप यकीन नहीं करें, लेकिन इन जानवरों की यह आदत रेगिस्तान में रहने वाली दूसरी प्रजातियों के लिए भी मददगार साबित हो सकती है।
शोधकर्ताओं ने वर्ष 2015 में इन जानवरों द्वारा खोदे कुओं का अध्ययन शुरू किया। इसके बाद तीन गर्मी के मौसम के दौरान एरिजोना की चार अलग-अलग जगहों पर इन कुओं और पानी के अन्य स्रोतों का नक्शा तैयार किया गया। वैज्ञानिकों को इस अध्ययन से कई चौंकाने वाले तथ्य मिले।
2015 से 2018 के बीच किए गए शोध में पता चला कि कुछ स्थानों पर जानवरों के खोदे गए कुएं उपलब्ध कुल सतही पानी का 74 फीसदी तक उपलब्ध करा सकते हैं। इतना ही नहीं, कैमरों में सोनोरन और मोजावे रेगिस्तान में इन कुओं के आसपास रीढ़ की हड्डी वाले जानवरों की 57 प्रजातियां कैद की गईं, जिनमें गाने वाले पक्षियों से लेकर पहाड़ी शेर तक शामिल थे।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, रिपोर्ट में सामने आए निष्कर्ष जंगली घोड़ों और गधों को लेकर चल रही बहस में एक नई बात जोड़ते हैं। इन जानवरों को अक्सर बाहरी या इनवेसिव प्रजाति माना जाता है, लेकिन शोध से सामने आया कि जमीन खोदकर बनाए गए उनके कुएं सूखे के दौरान अन्य जीवों के लिए भी पानी का इंतजाम कर सकते हैं।
पानी की तलाश में जमीन खोदते हैं जंगली घोड़े और गधे
शोध की शुरुआत इकोलॉजिस्ट एरिक लुंडग्रेन के एक ऑब्जर्वेशन से हुई। वर्ष 2014 में उन्होंने जंगली गधों को सूखी जमीन खोदते देखा, तो उनके मन में सवाल खड़ा हुआ कि क्या इन गड्ढों में जमा होने वाला पानी सिर्फ कुआं खोदने वाले जानवरों के काम आता है या अन्य जीव भी इसका लाभ उठा सकते हैं।
इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए लुंडग्रेन और उनकी टीम ने एरिजोना के सोनोरन रेगिस्तान में चार स्थानों का अध्ययन किया। उन्होंने घोड़ों और गधों द्वारा खोदे गए कुओं के साथ-साथ भूजल से पोषित नदियों और नालों में उपलब्ध सतही पानी के क्षेत्रफल का नक्शा तैयार किया। उन्होंने यह काम 2015 से 2018 के बीच तीन गर्मी के मौसम के दौरान किया। इस अवधि में गर्मी और बारिश के कारण पानी की उपलब्धता में होने वाले बदलावों पर भी ध्यान दिया गया।
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अध्ययन में खुलासा हुआ कि इन कुओं की मौजूदगी पानी की उपलब्धता में काफी अंतर पैदा कर सकती है। एक जगह पर नदी के सूख जाने के बाद जानवरों के खोदे गए कुएं ही पीने के पानी का एकमात्र स्रोत रह गए, जबकि दूसरी जगह पर इन कुओं से कुल उपलब्ध सतही पानी का 74 फीसदी तक हिस्सा मिला।
इन कुओं का एक और महत्वपूर्ण फायदा सामने आया। इन्होंने पानी के अलग-अलग स्रोतों के बीच की दूरी कम कर दी। अध्ययन के मुताबिक, आसानी से उपलब्ध होने वाले पानी के स्रोतों के बीच की दूरी 843 मीटर तक घट गई। रेगिस्तान जैसे इलाकों में यह बदलाव काफी अहम हो सकता है, क्योंकि नदियों और अन्य जलस्रोतों के सूखने पर जानवरों को पानी के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। साथ ही बचे हुए जलस्रोतों के आसपास अलग-अलग प्रजातियों के बीच प्रतिस्पर्धा भी बढ़ सकती है।
पानी उपलब्ध कराने के अलावा भी काम आते हैं कुएं
जंगली घोड़ों और गधों द्वारा खोदे गए कुओं का महत्व सिर्फ पानी उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। शोधकर्ताओं को अध्ययन में पता चला कि इन जानवरों के छोड़ दिए गए गड्ढे कॉटनवुड के नए पौधों के उगने के लिए भी अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर सकते हैं। कॉटनवुड के पौधों के विकास के लिए नम मिट्टी और खुली जगह की जरूरत होती है। लेकिन नदी के किनारों पर अक्सर पेड़-पौधों के बीच जगह और पानी के लिए प्रतिस्पर्धा होती है, जिससे इन पौधों को पनपने में कठिनाई हो सकती है।
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बाढ़ आती है, तो जमीन के कुछ हिस्से खुल जाते हैं, जहां नए पौधों को जड़ें जमाने का मौका मिल जाता है। हालांकि, बांधों की वजह से जिन इलाकों में बाढ़ कम आती है, वहां इस तरह की जगहें बनने के अवसर भी घट सकते हैं। अध्ययन में शामिल एक स्थान पर शोधकर्ताओं ने जानवरों द्वारा खोदे गड्ढों में कॉटनवुड के पौधों को उगते हुए देखा, जिनमें से कुछ पौधे गर्मियों की कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहे और उनकी ऊंचाई दो मीटर तक पहुंच गई।
इससे संकेत मिलता है कि इन जानवरों द्वारा खोदे गए कुएं उनके वहां से चले जाने के बाद भी पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। यानी उनका योगदान केवल तत्काल पानी उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आसपास की वनस्पतियों के विकास में भी भूमिका निभा सकता है।
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हो सकत हैं ये नुकसान भी
अध्ययन में पता चले नतीजों का मतलब यह नहीं है कि जंगली घोड़े और गधे नुकसान नहीं पहुंचाते या उनके द्वारा बनाए गड्ढों से हर इकोसिस्टम को फायदा होता है। घोड़ों और गधों को उत्तरी अमेरिका में लाया गया था और शोधकर्ताओं को पता चला कि वे सूखे इलाकों के पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकते हैं। वहां की मूल वनस्पतियों को रौंद सकते हैं। मिट्टी का कटाव बढ़ सकते हैं और भोजन-पानी के लिए वहां के मूल जानवरों से मुकाबला कर सकते हैं।