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आखिर कैसे बनते हैं अंतरिक्ष यात्री, कौन-कौन सी काबिलियत का होना जरूरी?

Thu, 16 Jan 2020 04:53 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
अंतरिक्ष की सैर का सपना तो हम में से बहुत से लोग देखते हैं, लेकिन अंतरिक्ष यात्री बनना आसान नहीं है। इसके लिए आम से खास बनना पड़ता है। मसलन आप में तुरंत फैसला करने की काबिलियत होनी चाहिए। आपकी सेहत आम लोगों के मुकाबले ज्यादा बेहतर होनी चाहिए। दबाव होने के बावजूद आपका जहनी सुकून डगमगाना नहीं चाहिए। एक अंतरिक्ष यात्री बनने के लिए ये चंद बुनियादी बातें हैं जिन्हें 'द राइट स्टफ' कहा जाता है। 

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अमेरिकी वायु सेना (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
आम तौर से अंतरिक्ष यात्री एयरफोर्स के बेहतरीन पायलट होते हैं। 1950 में नासा ने भी अपना पहला अंतरिक्ष यात्री एयरफोर्स के पायलट को ही चुना था। यही काम सोवियत संघ ने भी किया था। फर्क सिर्फ इतना था कि सोवियत संघ ने इस क्षेत्र में महिलाओं को भी शामिल कर लिया था। साथ ही लंबाई की बंदिश लगा दी। यानी किसी भी अंतरिक्ष यात्री की लंबाई पांच फीट छह इंच से ज्यादा नहीं हो सकती थी। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
करीब 60 साल से रिसर्च के लिए इंसान अंतरिक्ष में जा रहे हैं, लेकिन वहां जाने के लिए शर्तें आज भी वही हैं। मिसाल के लिए 2009 में यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने अपने यहां छह अंतरिक्ष यात्री भर्ती किए। इनमें से तीन फौज के पायलट हैं। एक पेशेवर पायलट है। एक स्काई डाइवर है, जबकि एक पर्वतारोही है। कोशिश यही रहती है कि बेहतरीन लोगों को ही अंतरिक्ष में भेजा जाए, लेकिन आम इंसान का अंतरिक्ष में रह पाना आसान नहीं होता है। 

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यूजीन सेरनन, अंतरिक्ष यात्री - फोटो : Social media
जमीन पर हम ऑक्सीजन के गिलाफ में रहते हैं। इसके बिना इंसानी वजूद की कल्पना नहीं की जा सकती, लेकिन धरती से दूर अंतरिक्ष में रहने वाले बनावटी सांसों के सहारे जीते हैं। उन्हें ब्रह्मांड में मौजूद रेडिएशन झेलना पड़ता है। इसका सीधा असर उनकी सेहत पर पड़ता है। शरीर कमजोर पड़ने लगता है। हर समय मतली महसूस होती रहती है। आंखें कमजोर हो जाती हैं। कमजोरी इतनी बढ़ जाती है कि बीमारियों से लड़ने की क़ुव्वत नहीं रहती। 
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अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन - फोटो : Pixabay
अंतरिक्ष यात्री ल्यूका परमितानो इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में करीब साढ़े पांच महीने रहे। वो कहते हैं कि जैसे-जैसे दिन गुजरते जाते हैं, आपकी टांगें खुद आपको ही कमजोर और पतली महसूस होने लगती हैं। चेहरा गोल होने लगता है। वापस धरती पर आने के बाद भी नॉर्मल होने में काफी समय लग जाता है। अंतरिक्ष में शुरुआत के दिनों में एक ही दिशा में चलना पड़ता है। छह महीने बाद आप धीरे-धीरे दूसरी दिशाओं में घूमना शुरू कर देते हैं। स्पेस स्टेशन की जगह को पहचानना शुरू करते हैं। जीरो गुरुत्वाकर्षण की वजह से अंतरिक्ष यात्री हवा में ही झूलते रहते हैं। लिहाजा आपकी टांगों का कोई काम नहीं रहता। अंतरिक्ष में बहुत लंबे समय तक टिक पाना आसान नहीं है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
अंतरिक्ष यात्री वैलेरी पोलियाकोव ने अब तक अंतरिक्ष में सबसे लंबा समय गुजारा है। वो 437 दिन तक अंतरिक्ष में रहे। हालांकि विचार किया जा रहा है कि अंतरिक्ष में ही ऐसी व्यवस्था की जाए जहां रिसर्चर फिट रह सकें। इसके लिए सबसे अहम है, उन्हें रेडिएशन से बचाना। साथ ही उनके लिए लाइफ सपोर्ट सिस्टम की व्यवस्था होना भी जरूरी है। इस सिलसिले में कई वर्कशॉप भी की जा चुकी हैं। अंतरिक्ष में बस्तियां बसाने पर चर्चा हुई है। इस वर्कशॉप में इंजीनियर, वैज्ञानिक और बड़े रिसर्चर शामिल हुए थे।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
अमेरिकी न्यूरो साइंटिस्ट रॉबर्ट हेम्पसन मानते हैं कि अंतरिक्ष में बस्तियां बसाना आसान काम नहीं। साथ ही इस काम को करने में लंबा समय लगेगा। तब तक अंतरिक्ष में जाने वालों को ही इस लायक बनाने की जरूरत है कि वो वहां के माहौल के मुताबिक खुद को ढाल सकें और सेहतमंद रह सकें। अंतरिक्ष में जिस तरह की बस्तियां बसाने की बात की जा रही है, वो सुनने में तो सहज लगती है, लेकिन असल में इसके नुकसान ज्यादा हैं। मिसाल के लिए अगर आज किसी नौजवान को ऐसी किसी कॉलोनी में भेजा जाएगा, तो उसकी आने वाली पीढ़ी धरती पर रहने लायक नहीं रहेगी। उसका शरीर अंतरिक्ष के माहौल के मुताबिक ही ढल जाएगा। उनकी जिंदगी धरती पर रहने वालों से जुदा होगी। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
अंतरिक्ष के लिए एक इंसानों की नई नस्ल तैयार करना आसान नहीं है। लिहाजा बेहतर है कि धरती पर ही इंसानों को अंतरिक्ष के लिए तैयार किया जाए। हालांकि एक ऐसी दुनिया का ख्याल दिलचस्प है जिसमें इंसान हवा में तैरते रहें। विज्ञान फंतासी वाली फिल्मों में हम ऐसी दुनिया देख चुके हैं, पर इन्हें हकीकत का जामा पहनाना फिलहाल तो मुमकिन नहीं। 
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