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20वीं सदी की वो महिला पत्रकार जो खुद पागलखाने में हो गई थी भर्ती, करना चाहती थी ये काम

Mon, 04 Feb 2019 05:52 PM IST
पंखुड़ी सिंह फीचर डेस्क, अमर उजाला
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मानसिक रूप से बीमार इंसान का घर हमेशा के लिए पागलखाना बन जाता है। सोचिये पूरी दुनिया में कितने पागल होंगे और कितने पागलखाने होंगे। हालांकि, एक सामान्य इंसान मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों में मरीजों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के विषय में कैसे जानेगा। उन मरीजों के साथ जानवरों जैसा बर्ताव करने वाले सिस्टम में गंभीर बदलाव की आवश्यकता थी। 20वीं शताब्दी में एक महिला पत्रकार की जिंदादिली ने इन संस्थानों के ऐसा राज खोले जिसने दुनिया को हिला कर रख दिया। जानिए क्या था पूरा मामला और वो महिला कौन थी। 
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- फोटो : facebook
19वीं शताब्दी की वो महिला पत्रकार जिसने महिला मनोरोग अस्पतालों की भयानक स्थितियों को दुनिया के सामने लाने के लिए पर अपनी जान पर खेलकर काम किया था। वे खुद पागल बनकर 10 दिनों तक पागलखाने में रहीं थीं। 1887 में पत्रकार नेली ब्लाइ ने एक प्रयोग किया जिससे लोगों को पागलों की व्यथा का अंदाजा हो पाया। 
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नेली न्यूयॉर्क विश्व समाचार पत्र के लिए एक अंडरकवर असाइनमेंट करने के लिए सहमत हुई, जिसका उद्देश्य न्यूयॉर्क में ब्लैकवेल द्वीप पर महिलाओं के पगलखाने की भयानक स्थितियों की जांच करना था। बाद में नेली ने पूरा अनुभव टेन डेज़ इन ए मैड-हाउस ’नामक अपनी पुस्तक में प्रकाशित किया था ।

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- फोटो : facebook
उन्हें पागलपन विशेषज्ञों को धोखा देने की अपनी क्षमता पर बहुत कम विश्वास था।पागलखाने में रहने के लिए, नेली को एक 'पागल औरत' के रूप में खुद को करना था, और वो आसान नहीं था।
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- फोटो : facebook
वह पूरा दिन शीशे के सामने पागल बनने का अभ्यास करने में बिताती थी, उन्होंने नहाना भी बंद कर दिया था। एक बार जब नेली को खुद पर विश्वास हो गया तो नेल्ली ब्राउन नाम से महिलाओं के पागलखाने में खुद को पंजीकृत किया और स्टिंग ऑपरेशन शुरू कर दिया। नेली ने 10 दिन पागलखाने में बिताए और जो कुछ उन्होंने देखा वह उससे सदमे लगा।
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अपनी पुस्तक में उन्होंने लिखा कि बुरी तरीके से रोगियों को यातनाएं दी जाती थीं।जैसे मरीजों को अतिरिक्त कपडे नहीं दिए जाते थे और ठंड में छोड़ दिया जाता था।दिए गए आदेशों का पालन न करने पर महिलाओं को लगातार मारा जाता था। नेली ने यह भी उल्लेख किया है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए कोई सुरक्षा उपाय नहीं किए गए थे। उचित देखभाल के बजाय रोगियों को रस्सियों में बांध दिया जाता था।
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अपनी रिहाई के कुछ समय बाद, नेली नै अपनी पुस्तक प्रकाशित की जिसमें उन्होंने सभी यातनाओं को लिखा जो पागलखाने में सहीं।पुस्तक जल्दी से हिट हो गई और जूरी द्वारा जांच की गई। जूरी ने सार्वजनिक धर्मार्थ विभाग और सुधार विभाग के बजट में $ 850.000 की वृद्धि की और यह भी सुनिश्चित किया कि भविष्य में केवल गंभीर रूप से बीमार रोगी ही पागलखाने जाएंगे।
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