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क्या है 'दुनिया की सबसे मुश्किल परीक्षा' गाओकाओ और ये होती कैसे है?

Thu, 09 Jul 2020 09:05 AM IST
सोनू शर्मा बीबीसी हिंदी
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गाओकाओ की परीक्षा दे रहे छात्र - फोटो : Facebook/NEWS.CN
हर साल चीन में दो दिनों के लिए सस्पेंस का माहौल रहता है। ये दो दिन देश के लाखों किशोर बच्चे अपनी किस्मत पर दांव लगाते हैं। इस साल जुलाई की सात और आठ तारीख को चीन के तकरीबन एक करोड़ सात लाख हाई स्कूल स्टूडेंट्स 'गाओकाओ' का इम्तेहान दिया। ये इम्तेहान की वो घड़ी होती है जब चीन की शिक्षा व्यवस्था में इस बात का फैसला होता है कि यूनिवर्सिटी में किसे दाखिला मिलेगा और किसे नहीं। 

चीन के किशोर उम्र के बच्चे सालभर इस इम्तेहान की तैयारी करते हैं, कम से कम 12 घंटे हर रोज पढ़ते हैं और इसमें कामयाबी हासिल करने का उन पर जबरदस्त दबाव रहता है। स्कूली जिंदगी का उनका बड़ा हिस्सा इस टेस्ट को ध्यान में रखते हुए पढ़ाई में बीतता है। बहुत से बच्चों के लिए समाज में तरक्की की सीढ़ी चढ़ना का एकमात्र रास्ता है, इस परीक्षा में अच्छे नंबर लाना। 
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किताबें उठाकर ले जाते छात्र - फोटो : Social media
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में ग्लोबल इनिशिएटिव फॉर एजुकेशनल इनोवेशन सेंटर के रिसर्चर श्वेक्विन जियांग कहते हैं, 'उनके दिमाग में एक ही बात होती है, ये उनके लिए जंग में जाने जैसा है। शिक्षक उन्हें बताते हैं कि ये इम्तेहान उनके लिए जिंदगी और मौत का सवाल है। जिस दिन आपका बच्चा पैदा लेता है, आप उसी दिन से ये सोचने लगते हैं कि वो गाओकाओ में अपना सबसे अच्छा प्रदर्शन कैसे करे।' 

परीक्षा से एक दिन पहले ये बच्चे समूहों में इकट्ठा होते हैं, युद्ध के गीत गाते हैं ताकि उनका मनोबल बढ़ सके। 'हम विजय हासिल करने के लिए जा रहे हैं। हम गाओकाओ पर जीत हासिल करने के लिए जा रहे हैं।' परीक्षा के दिन बच्चों के माता-पिता और घरवाले उन्हें शुभकामनाएं देने के लिए घरों से बाहर निकलते हैं और इम्तेहान के वक्त कोई बच्चा किसी किस्म की गड़बड़ी न करे, प्रशासन इसके लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहा होता है। इसके लिए पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था की जाती है, निगरानी कैमरे लगाए जाते हैं, ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) टेक्नोलॉजी का सहारा लिया जाता है और यहां तक कि हवाई निगरानी के लिए ड्रोन भी तैनात किए जाते हैं। 
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गाओकाओ की परीक्षा देने जाती एक छात्रा - फोटो : Social media
साल 2016 में चीन की सरकार ने ये घोषणा की थी कि गाओकाओ में गड़बड़ी करने वाले छात्रों को जेल की सजा दी जा सकती है। और उन लम्हों में जब बच्चों की योग्यता का मूल्यांकन हो रहा होता है तो सब कुछ खामोश रहता है। ये तय किया गया है कि ऐसा कुछ न किया जाए या हो जिससे अपने जीवन की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा दे रहे बच्चों का ध्यान जरा सा भी भटके। सड़कें बंद रहती हैं। स्कूलों के नजदीक कंस्ट्रक्शन वर्क्स रोक दिए जाते हैं। बच्चों के लिए यातायात का विशेष प्रबंध किया जाता है और मेडिकल टीमों को अलर्ट पर रखा जाता है। 

इस साल गाओकाओ के लिए तय किए गए प्रोटोकॉल के तहत परीक्षा दे रहे बच्चों के बीच कोरोना वायरस से संक्रमण के खतरे को कम करने के लिए एहतियात भी शामिल किए गए थे। ऐसे में सवाल उठता है कि गाओकाओ दरअसल चीज क्या है और इसमें ऐसा क्या होता है जो इसे 'दुनिया का सबसे मुश्किल इम्तेहान' बना देता है और लोग इसकी क्यों आलोचना करते हैं? 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
एक बेहद प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षा

'गाओकाओ' का शाब्दिक अर्थ होता है उच्च शिक्षा के लिए प्रवेश परीक्षा। चीन में इसकी शुरुआत साल 1952 में हुई थी, लेकिन माओ जेडांग की सांस्कृतिक क्रांति के दौरान साल 1966 और 1976 के बीच इसे रोक दिया गया था। साल 1977 से गाओकाओ की परीक्षा को एक ऐसे अवसर के तौर पर देखा जा रहा है, जिसके जरिए सीमित संसाधनों और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाला कोई छात्र बेहतर भविष्य के रास्ते पर आगे बढ़ सकता है। 

चीन के हर क्षेत्र में गाओकाओ की परीक्षा के अपने प्रारूप हैं, लेकिन सामान्य शब्दों में कहें तो इस इम्तेहान में चीनी भाषा, गणित और एक विदेशी भाषा से जुड़े सवाल शामिल होते है। इसके अलावा बच्चे, इतिहास, राजनीति, भूगोल, बॉयोलॉजी, फिजिक्स या केमिस्ट्री जैसे दूसरे सब्जेक्ट भी चुन सकते हैं। चीन में ये परीक्षा दो से चार दिनों में पूरी होती है, लेकिन ये इस बात पर निर्भर करता है कि परीक्षा किस इलाके में हो रही है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
प्रोफेसर योंग झाओ यूनिवर्सिटी ऑफ कंसास के स्कूल ऑफ एजुकेशन में पढ़ाते हैं और 'हू इज अफ्रेड ऑफ दी बिग बैड ड्रैगन: वाई चाइना हैज द बेस्ट (एंड वॉर्स्ट) एजुकेशन सिस्टम इन द वर्ल्ड' नाम से किताब लिख चुके हैं। वे कहते हैं, 'जरूरी नहीं है कि ये मुश्किल हो, पर इसमें बहुत कॉम्पिटिशन है।' 

प्रोफेसर योंग झाओ के विचारों से श्वेक्विन जियांग भी सहमत हैं। वे कहते हैं, 'परीक्षा में पूछे जाने वाले सवालों के लिहाज से ये इम्तेहान मुश्किल नहीं है।' श्वेक्विन जियांग कहते हैं, 'बहुत दबाव रहता है और ये इस वजह से नहीं रहता है कि आप कैसा प्रदर्शन कर रहे हैं बल्कि आप अपने सहपाठियों की तुलना में कैसा प्रदर्शन कर रहे हैं। गाओकाओ की परीक्षा याद की गई और सीखी गई जानकारी का समस्याओं के समाधान में इस्तेमाल पर आधारित है।' 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
क्या ये 'दुनिया की सबसे मुश्किल परीक्षा' है?

गाओकाओ की परीक्षा में शामिल होने वाले बच्चों पर बहुत दबाव रहता है। जियांग बताते हैं, 'किसी क्लास के केवल दस फीसदी बच्चे ही टॉप की यूनिवर्सिटी में जगह बना पाते हैं और अगर आप नाकाम होते हैं तो हम फेल कहा जाता है। दबाव इसी वजह से आता है।' 

शिक्षाविद और 'अदर वेज टू लर्न' के लेखक एलेक्स बियर्ड के अनुसार, 'प्रतियोगिता की इस स्थिति की वजह से ही कुछ लोग इसे 'दुनिया की सबसे मुश्किल परीक्षा' के रूप में देखते हैं। कल्पना कीजिए कि हर साल लाखों बच्चे इस परीक्षा के लिए प्रतियोगिता का सामना करते हैं। उदाहरण के लिए शंघाई में रहने वाला 15 साल का एक छात्र गणित के विषय में यूरोप के किसी हमउम्र छात्र की तुलना में तीन साल आगे होगा, विज्ञान में उसकी काबिलियत डेढ़ साल आगे होगी।' 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
एलेक्स बियर्ड का कहना है कि ये परीक्षा किसी देश के छात्रों के ज्ञान के स्तर को मापने का अच्छा तरीका है, लेकिन इसकी अपनी सीमाएं हैं। गाओकाओ की तैयारी करने वाले बच्चों के बारे में एलेक्स कहते हैं, 'किसी चीजों को आलोचनात्मक या सृजनात्मक रूस से सीखने-समझने का ये तरीका नहीं होता है। वे परीक्षा के सवालों का जवाब देने के लिए कुछ सीख रहे होते हैं। चीन में पूरी शिक्षा व्यवस्था इस मकसद से तैयार की गई है ताकि बच्चों को परीक्षा के सवालों का जवाब देने के लिए तैयार किया जा सके। उन्हें एक ऐसे शख्स के रूप में तैयार करने पर ध्यान नहीं दिया जाता, जिसके पास कई मुद्दों पर जानकारी और समझदारी हो।' 

प्रोफेसर योंग झाओ भी यही कहते हैं, 'हरेक छात्र इसी परीक्षा की तैयारी कर रहा होता है और उन्हें दूसरे चीजों पर ध्यान देने के लिए कोई मौका ही नहीं मिलता है। जो चीजें उसकी जिंदगी के लिए ज्यादा जरूरी हों, जैसे कि क्रिएटिविटी या किसी चीज को आलोचनात्मक नजरिए से देखने की सोच।'  

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
जंग की तैयारी

श्वेक्विन जियांग कहते हैं, 'चीन में जब बच्चे प्री-स्कूल में होते हैं, तब से ही उन पर बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव दिया जाने लगता है। आप अपने सहपाठियों को दोस्त के तौर पर नहीं देखते बल्कि उन्हें अपना प्रतिस्पर्धी मानने लगते हैं।' चीन में ये सामान्य बात है कि एक छात्र गाओकाओ की परीक्षा की तैयारी में हर दिन 12 से 13 घंटे की पढ़ाई करे। पहले स्कूल में फिर प्राइवेट कोचिंग क्लासेज में।

एलेक्स बियर्ड बताते हैं, 'सभी लड़के ये करते हैं। उन सभी को ऐसा करने के लिए मजबूर किया जाता है। उन्हें कहा जाता है कि आप ये नहीं करेंगे तो आप पीछे रह जाएंगे। चीन में प्राइवेट स्कूल बहुत बड़ा बिजनेस है। ये तकरीबन 100 अरब डॉलर सालाना का कारोबार है।' 

तो इसका मतलब ये हुआ कि छात्र स्कूल और प्राइवेट कोचिंग के बीच गाओकाओ की तैयारी ही करते रह जाते हैं। श्वेक्विन जियांग कहते हैं, '15 या 16 साल के एक लड़के के लिए ये परीक्षा क्लासरूम में परीक्षा के सवालों का जवाब देने से ज्यादा कुछ नहीं है।' 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
और इस तैयारी में केवल छात्र ही शामिल नहीं होते। प्रोफेसर योंग झाओ बताते हैं, 'पूरा परिवार ही बच्चे का ख्याल रखने के लिए लगा रहता है। इसका मतलब ये नहीं कि परिवार बच्चों को अच्छा अनुभव देने की कोशिश करते हैं। वे बस इस बात का ध्यान रखते हैं कि बच्चे का ध्यान नहीं भटके। सबकुछ एक परीक्षा के इर्दगिर्द घूम रहा होता है और किसी शिक्षा व्यवस्था के लिए यही समस्या की जड़ है।'

प्रोफेसर योंग झाओ और श्वेक्विन जियांग दोनों ही इस बात से सहमत हैं कि गाओकाओ की तैयारी बच्चों को उन अनुभवों से मरहूम कर देती है जो वे अपनी जिंदगी में हासिल कर सकते थे। योंग झाओ कहते हैं, 'मुझे नहीं लगता कि ये परीक्षा बच्चों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करती है। ये उनकी प्रतिभा को बरबाद करने जैसा है।'  
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
तरक्की के लिए अवसर

भले ही ये परीक्षा कितनी ही थकाऊ हो, लेकिन इसे एक निष्पक्ष और पारदर्शी परीक्षा के रूप में माना जाता है। प्रोफेसर योंग झाओ कहते हैं, 'चीन में लोगों की अक्सर ये राय रहती है कि यहां बहुत सारी चीजों में भ्रष्टाचार है, लेकिन गाओकाओ के बारे में उनकी राय ऐसी नहीं है।' 

हालांकि श्वेक्विन जियांग इसे दूसरी तरह से देखते हैं। उनका कहना है कि इस परीक्षा को सरकार अपने नियंत्रण के औजार के रूप में देखती है। 'गाओकाओ की परीक्षा ये दिखलाती है कि चीन में काबिलियत को जगह दी जाती है। जब तक लोग ये मानते रहेंगे कि गाओकाओ की परीक्षा निष्पक्ष है, लोग इस व्यवस्था का आदर करते रहेंगे।' 

श्वेक्विन जियांग बताते हैं कि देश में इस परीक्षा में सुधार के लिए आवाजें उठती रही हैं जबकि धनी परिवार अपने बच्चों को पढ़ने के लिए विदेश भेज देते हैं। प्रोफेसर योंग झाओ का कहना है कि देश में दो तरह के लोग हैं, एक वो हैं जो ये सोचते हैं कि गाओकाओ को नहीं जारी रखना चाहिए तो दूसरी तरफ वैसे लोग भी हैं जो ये मानते हैं कि गाओकाओ देश की एकमात्र निष्पक्ष चीज है और इसी वजह से इसे बचाए रखा जाना चाहिए। 
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