यह मामला जून 2010 का है तब पटना में भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई थी। इसी दौरान बिहार के अखबारों में बाढ़ में मदद करने को लेकर मोदी की तस्वीर नीतीश कुमार के साथ छपी थी। नीतीश को मोदी के साथ वो तस्वीर बिल्कुल रास नहीं आई और उन्होंने दिया भोज कैंसल कर दिया। इसके साथ ही नीतीश ने गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर मोदी से बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए मिले पांच करोड़ रुपए को वापस कर दिया था।
नीतीश की खामोशी में बेबसी या गुस्सा?
क्या नीतीश का वो तेवर अब इतिहास बन गया? आखिर नीतीश की ऐसी कौन सी मजबूरी है जिसके कारण उन्हें इस कदर झुकना पड़ा? पिछले साल 14 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पटना यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में पहुंचे थे। नीतीश कुमार ने भरी सभा में मंच से सार्वजनिक रूप से पीएम मोदी से पटना विश्वविद्याल को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देने की मांग की, लेकिन इसे अनसुना कर दिया गया। मंच पर मोदी भी मौजूद थे। इसे अपमान के तौर पर देखा गया, लेकिन नीतीश कुमार चुप रह गए।
पिछले साल नीतीश के दोबारा एनडीए में शामिल होने के बाद से केंद्र की मोदी कैबिनेट का विस्तार हुआ, लेकिन जेडीयू से किसी को शामिल नहीं किया गया। इसे लेकर जेडीयू के भीतर भी बंद मुंह वाली बेचैनी देखी गई, लेकिन नीतीश कुमार खामोश रह गए। बिहार को विशेष दर्जा दिलाने को लेकर नीतीश ने 2014 के आम चुनाव से लेकर 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव तक कैंपेन चलाया, लेकिन अब वो केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के साथ हैं तो पूरी तरह से चुप्पी मार ली।
हाल में ही बिहार में सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने और मुसलमानों पर हमले के कई वाकये हुए। इनमें बीजेपी नेताओं और अन्य हिन्दुवादी संगठनों की भागीदारी प्रत्यक्ष रूप से सामने आई, लेकिन नीतीश कुमार ने चुप रहना ही ठीक समझा। बिहार बीजेपी अध्यक्ष नित्यानंद राय ने सार्वजनिक रूप से प्रदेश में कहा कि मोदी के विरोध करने वालों के हाथ काट लेंगे, लेकिन नीतीश खामोश रहे। जब जून 2013 में नीतीश कुमार ने बीजेपी का 17 साल पुराना साथ छोड़ा था तो वो मोदी को ललकारते हुए निकले थे। अब नीतीश इतने बेबस क्यों दिख रहे हैं?
एनडीए में नीतीश का रुतबा कम हुआ?
जेडीयू में कई अहम पदों पर रहे और पूर्व राज्यसभा सांसद शिवानंद तिवारी कहते हैं, ''नीतीश कुमार की अब ऐसी स्थिति हो गई है कि न बीजेपी का साथ छोड़ सकते हैं और ही सहज होकर रह सकते हैं। एक वक़्त था जब नीतीश कुमार के पीछे-पीछे बीजेपी चलती थी। बीजेपी नीतीश के कारण ही अपने स्टार नेता मोदी को बिहार में चुनाव प्रचार करने के लिए भेजने की हिम्मत नहीं कर पाती थी।'' शिवानंद कहते हैं, ''नीतीश कुमार अब कैसी राजनीति कर रहे हैं इसे बिहार में हाल में हुए सांप्रदायिक हमलों से भी समझ सकते हैं। महागठबंधन के जनादेश को धोखा देकर उन्होंने उन्हीं ताकतों को गले लगाया जिनके खिलाफ वो चुनाव लड़े थे। वो इनके खिलाफ मुखर होकर बोलते थे। जिनके पास वो गए हैं उनका मन बढ़ गया है।''
''इसके पहले एनडीए में थे तो नीतीश कुमार का अपर हैंड था। नीतीश के एजेंडे पर गठबंधन चलता था। अब वो दोबारा गए हैं तो बीजेपी समझ गई है कि नीतीश कुमार नकली आदमी हैं। इस आदमी की कोई नैतिकता नहीं है और सत्ता के लिए कुछ भी कर सकता है।'' ''इस मामले में तो मेरा आकलन भी बिल्कुल गलत साबित हुआ। हमने लंबे समय से नीतीश कुमार के साथ काम किया और अब सार्वजनिक रूप से कह रहा हूं कि मैं मूर्ख था कि नीतीश कुमार को समझ नहीं पाया।''
शिवानंद तिवारी को लगता है कि उन्होंने नीतीश कुमार को समझने में बड़ी भूल की। तिवारी कहते हैं, ''ये आदमी सार्वजनिक मंचों पर तो खुद को ऐसे पेश करता है कि असली चेहरा छुप जाता है। और छुपाकर रखने में अब तक कामयाब रहा है।'' ''लोग ये कल्पना कर रहे थे कि 2019 में नरेंद्र मोदी की कट्टर छवि के मुकाबले नीतीश कुमार की उदार छवि पेश की जाएगी। मैं तो कहता हूं कि देश बच गया। अगर गलती से भी नीतीश कुमार देश के प्रधानमंत्री हो गए होते तो समझिए कि पता नहीं देश को कहां बेच देते।''