कारू बाबा के मंदिर में दूध चढ़ाते हैं श्रद्धालु।
- फोटो : अमर उजाला
आज नवरात्रि का सातवां दिन है और इस दिन देवी दुर्गा साके सातवें स्वरुप माता कालरात्रि की पूजा की जाती है। माता कालरात्रि को शुभंकरी, महायोगीश्वरी और महायोगिनी भी कहा जाता है। माता कालरात्रि की विधिपूर्वक पूजा करने और व्रत रखने से माता अपने भक्तों की सभी बुरी शक्तियों और काल से रक्षा करती हैं, अर्थात माता की पूजा करने से भक्तों को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। मां के इस स्वरूप से सभी सिद्धियां प्राप्त होती हैं इसलिए तन्त्र मंत्र करने वाले लोग विशेष रूप से मां कालरात्रि की उपासना करते हैं। आज के दिन सहरसा जिला मुख्यालय से बीस किलोमीटर और महिषी प्रखंड मुख्यालय से तीन किलोमीटर दूर महपुरा स्थित 17 वी सदी के लोक देवता संत बाबा कारू का मंदिर में पूजा का खास महत्व है।
नवरात्रि की सप्तमी तिथि को जिले ही नहीं दूर-दूर से लोग खासकर मवेशी पालक दूध चढ़ाने आते हैं। बुधवार को सुबह से ही लोगों की भीड़ दूध चढ़ाने के लिए जुटने लगे। स्थानीय प्रशासन और मंदिर कमिटी के लोग भीड़ को नियंत्रित करने में लगे रहे। इसके कारण मंदिर के बगल से गुजरने वाली कोसी नदी में पानी दूध जैसे रंग में बहने लगता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, कोसी नदी के बीच में यह मंदिर स्थापित है। कितना भी भयंकर बाढ़ आ जाय लेकिन मंदिर परिसर में पानी नहीं घुसता है। अगल बगल के घरों को कोसी नदी अपने साथ बहा कर ले जाती है। लेकिन, मंदिर में सब कुछ यथावत रहती है। नदी ने आज तक मंदिर या मंदिर के भूभाग को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाया है।
कारू खिरहर को लोक देवता बना दिया है
स्थानीय लोग बताते हैं कि लोगों की आस्था ने कारू खिरहर को लोक देवता बना दिया है। मान्यता है कि मवेशियों के किसी भी तरह की परेशानी को दूर करने के लिए बाबा कारू का नाम, उनकी आराधना ही काफी है। इसीलिए पशुपालक अपने मवेशी का पहला दूध बाबा को अर्पण करते हैं। आज भी प्रत्येक दिन बाबा को सैंकड़ों क्विंटल दूध और चावल चढ़ाने की परंपरा बनी हुई है। इसी चढ़ावे के दूध से कारू खिरहर मंदिर में दिनभर खीर का प्रसाद बनता और बंटता रहता है। आश्विस मास में मनाये जाने वाले दुर्गापूजा की सप्तमी को लाखो लोग मंदिर आते है। उस दिन बाबा को इतने अधिक लोग दुग्धाभिषेक करते हैं कि बहते हुए दूध से पीछे बह रही कोसी नदी का जल पूरी तरह सफेद हो जाता है और लोग दूध की नदी का साक्षात दर्शन करते हैं।
पशुओं के देवता के रूप में है प्रसिद्धि
पशु पालकों की माने तो संत बाबा कारू पशुओं का देवता हैं। पशु कितना भी बीमार क्यों नही हो यदि उसे इस मंदिर में ले कर आया जाता है तो वह चंगा हो जाता है। स्थानीय नंदन कुमार कहते हैं कि पशुओं के प्रति अगाध प्रेम और समर्पण ने इन्हें देवताओं की श्रेणी में खड़ा का दिया। आज यह लाखों-करोड़ों लोगों की आस्था के प्रतीक है। मान्यता है कि कारू बाबा स्थान में मांगी जाने वाली सभी मनोकामनाएं निश्चित रूप से पूरी होती है। यहां प्रत्येक दिन श्रद्धालुओं का आना लगा रहता है। कारू स्थान में बाबा से मांगी जाने वाली हर मुराद पूरी होती है। मनोकामना पूर्ण होने के बाद लोग बाबा का आभार जताने व चढ़ावा चढ़ाने दोबारा जरूर आते हैं।