मृतका सुनीता देवी (फाइल फोटो), घर के बाहर लगी लोगों की भीड़
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गोपालगंज जिले के मांझा थाना क्षेत्र अंतर्गत सेखटोली गांव में शुक्रवार रात एक दर्दनाक हादसे ने पूरे गांव को स्तब्ध कर दिया। 40 वर्षीय सुनीता देवी भोजन के बाद आराम कर रही थीं, उन्हें दीवार पर रखी पानी की बोतल लेने के दौरान एक जहरीले सांप ने डंस लिया। यह घटना उस वक्त घटी जब वह प्यास लगने पर उठीं और अंधेरे में दीवार की ओर बढ़ीं। सांप दीवार में छिपा था और जैसे ही उन्होंने हाथ बढ़ाया, उसने डंस लिया।
इलाज की कोशिशें नाकाम, सदर अस्पताल में हुई मौत
सर्पदंश के तुरंत बाद परिजन उन्हें मांझा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर पहुंचे। वहां प्राथमिक उपचार के बाद गंभीर हालत को देखते हुए चिकित्सकों ने उन्हें गोपालगंज सदर अस्पताल रेफर कर दिया। परिजन बगैर देर किए उन्हें सदर अस्पताल ले गए, लेकिन वहां पहुंचते ही डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। डॉक्टरों द्वारा मौत की बात बताते ही घर में मातम पसर गया और परिजन अंतिम संस्कार की तैयारियों में जुट गए।
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ओझाओं के पास शव लेकर भटकते रहे परिजन
हालांकि इसी बीच अंधविश्वास का मामला भी सामने आया, जहां कुछ लोगों ने परिजनों को यह सलाह दी कि सर्पदंश से मृत व्यक्ति के शरीर में 24 घंटे तक प्राण छिपे रहते हैं। ओझा या वैद्य की मदद से उसे पुनर्जीवित किया जा सकता है। इस पर विश्वास करते हुए परिजन मृतका के शव को लेकर गांव-गांव ओझाओं और वैद्यों के पास भटकते नजर आए। मृतका के पति दुर्गेश चौरसिया समेत परिवार के अन्य लोग इस भ्रम में पड़ गए कि शायद कोई दैवीय शक्ति या तांत्रिक विद्या उनकी पत्नी को जीवनदान दे दे।
तीन बच्चों की मां सुनीता देवी के जाने से टूटा परिवार
सुनीता देवी अपने परिवार की रीढ़ थीं। उनके तीन बच्चे प्रियंका कुमारी, शिवानी कुमारी और प्रियांशु अभी पढ़ाई कर रहे हैं। घर की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर थी। उनकी असमय मौत ने न केवल परिवार को गहरा सदमा दिया है, बल्कि बच्चों के सिर से मां का साया उठने से भविष्य पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
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गांव में पसरा मातम, उमड़ी भीड़
घटना की खबर जैसे ही आसपास के इलाकों में फैली, गांव में सन्नाटा और मातम छा गया। लोग सुनीता देवी की अंतिम झलक पाने के लिए उनके घर पर एकत्र होने लगे। वहीं, कुछ लोग परिजनों को वास्तविकता स्वीकार करने और अंतिम संस्कार करने की सलाह देते रहे, लेकिन अंधविश्वास की पकड़ में आए परिजन उम्मीद छोड़ने को तैयार नहीं थे।