सत्ताधारी दलों का आरोप- रेलवे में नौकरी के बदले ली गई जमीन पर बन रहा यह आलीशान भवन।
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भवन के दो विकल्प, दोनों पर विवादों का गहरा साया
पटना के 10 सर्कुलर रोड को छोड़ने की नोटिस के समय ही यह सामने आया कि लालू प्रसाद का परिवार महुआबाग में बन रहे अपने निज आवास में जाएगा। लेकिन, जब कुछ सामान को वेटनरी कैंपस की ओर भेजे जाने की बात सामने आई तो कौटिल्य नगर में निर्माणाधीन भवन की बात भी खुली। सत्तापक्ष के नेताओं का आरोप है कि महुआबाग की जमीन रेलवे में नौकरी हासिल करने वाले किसी शख्स से ली गई है। उसकी जांच की मांग तेज होने से पहले कौटिल्य नगर के भवन की जानकारी सामने आई। यह जमीन पहले से विवादों में है। राजनीति में चमकने से पहले वेटनरी कॉलेज के एक जर्जर हिस्से में लालू रहते थे। उसी के पीछे यह इलाका है। इसे जमीन घोटाला बताते हुए दस्तावेजों के साथ कोर्ट में लड़ाई लड़ने वाले आरटीआई कार्यकर्ता विकास चंद्र उर्फ गुड्डू बाबा इस मामले में सामने उतर आए, जब उप मुख्यमंत्री और राज्य के राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने पत्रकारों के सवाल के जवाब में कहा कि अगर कोई शिकायत आई तो वह इस जमीन की जांच कराएंगे।
विश्वविद्यालय से कॉलेज को मिली जमीन, जिसपर साेसायटी बना बंदरबांट किया गया। इसलिए, यहां भी सवाल उठा।
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लालू ही नहीं, हर पार्टी के नेताओं के पास यह जमीन
लालू प्रसाद यादव के कौटिल्य नगर आवास को लेकर भले हंगामा हो रहा है, लेकिन सीधे तौर पर किसी बड़े चेहरे को उतर कर लड़ते नहीं देखा जा रहा है। वजह यह है कि यह जमीन कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्रा के समय 1986 में 'सांसद-विधायक को-ऑपरेटिव सोसायटी' गठित कर उसे दी गई थी। पूरे 20 एकड़ जमीन है। दस्तावेज बताते हैं कि यह जमीन 1916 में पटना विश्वविद्यालय को मिली थी। बाद में इसे वेटनरी कॉलेज को दिया गया। वेटनरी कॉलेज की जमीन किसी को-ऑपरेटिव सोसायटी को देने का मामला कोर्ट में ले जाने वाले विकास चंद्र उर्फ गुड्डू बाबा कहते हैं कि "जनोपयोगी नहीं, बंदरबांट के लिए जनता की जमीन इस सोसायटी को दी गई। पहले तो विश्वविद्यालय-कॉलेज की यह जमीन सोसायटी को नहीं दी जानी चाहिए थी। दूसरी बात यह कि 1086 में लीज किया गया और उसकी अवधि अप्रैल 2016 तक ही थी। एक्सटेंशन नहीं हो रहा था, लेकिन चुनाव के पहले अचानक कर दिया गया। वजह यह है कि इसमें उस समय के तमाम दलों के नेताओं के नाम जमीन बांटी गई थी। तीसरी बात यह कि लीज की शर्तों में स्पष्ट था कि पटना में जिनके पास जमीन-मकान है, उन्हें यहां जमीन नहीं मिलेगी या जो यहां जमीन लेंगे, उन्हें सरकार सरकारी आवास नहीं देगी। इसके साथ ही इसकी जमीन बेचने या हस्तांतरित करने पर भी रोक है। लेकिन, यहां सब खेल चला है।"
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सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच इसपर भी भारी लड़ाई
सत्ताधारी जदयू और भाजपा ने इन भवनों को लेकर लालू परिवार पर हमला जारी रखा है। जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने महुआबाग की जमीन को रेलवे में नौकरी के बदले लिए जाने की बात कर ईडी की जांच के दायरे में बताया था। नीरज ने कौटिल्य नगर में लगभग तैयार आलीशान भवन के निर्माण खर्च पर भी सवाल उठाया। इसके जवाब में राष्ट्रीय जनता दल के विधायक भाई वीरेंद्र मुखर होकर सामने आए और कहा कि महुआबाग की जमीन बहुत पहले लालू परिवार ने खरीदी थी और अब मकान बन रहा है तो सत्ता पक्ष के लोग अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं। जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने 'अमर उजाला' से बातचीत में कहा कि लगे हाथ व्हाइट हाउस बनवाने वाले की भी जांच कर दी जाए तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। इधर, भाजपा प्रवक्ता नीरज कुमार ने साफ तौर पर कहा- "लालू यादव, राबड़ी देवी या तेजस्वी यादव को विधायक, विधान पार्षद या सांसद के रूप में ही राशि मिली और कोई घोटाला नहीं किया गया तो इतनी जमीनें कहां से निकल रही और ऐसे आलीशान भवन कहां से बन रहे! लालू जब सत्ता में थे तो पटना म्यूजियम के सामने व्हाइट हाउस अचानक बन गया था। तब राजद के लोग भी इसे लालू का महल बताते थे, लेकिन फिर चारा घोटाले की जांच शुरू हुई तो यह बेनामी निकला। जांच होती जाएगी तो ऐसे खुलासे होते रहेंगे।"