बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की जयंती मनाने के लिए बिहार की राजनीति में होड़ लगी है। कर्पूरी ठाकुर लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के राजनीतिक गुरु थे।
इन दोनों नेताओं ने जनता पार्टी के दौर में कर्पूरी ठाकुर की उंगली पकड़कर सियासत के गुर सीखे। लालू यादव ने जब सत्ता की कमान संभाली तो कर्पूरी ठाकुर के कामों को ही कुछ दिनों तक आगे बढ़ाने का काम किया।
कर्पूरी ठाकुर के जीवन काल में उनका कोई परिजन या रिश्तेदार राजनीति में कोई पद नहीं पा सका। लेकिन कर्पूरी के चेले लालू के सभी लाल राजनीति में हैं। कर्पूरी जी देर शाम कभी किसी आईएएस अफसर को फोन नहीं करते थे। कहते थे कि शाम में वे लोग कुछ खाते-पीते हैं, अपनी दुनिया में रहते हैं। अब के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार रात हो या दिन कभी भी नौकरशाह को फोन मिलाते हैं। फरमान जारी करते हैं।
17 फरवरी 1988 को अचानक तबीयत बिगड़ने के चलते कर्पूरी ठाकुर का निधन हो गया था, लेकिन उनका सामाजिक न्याय का नारा आज भी बिहार में बुलंद है। कर्पूरी जयंती के नाम पर बिहार के राजनेताओं ने एक दूसरे पर जमकर आरोप-प्रत्यारोप लगाए।
किसी ने कहा कि कुछ लोग वोट के लालच में कर्पूरी जयंती मना रहे हैं। कुछ लोग चेहरा चमकाने के लिए जयंती मना रहे हैं। समाजवादी आंदोलन के कर्पूरी ठाकुर को उनकी सादगी और ईमानदारी के लिए जाना जाता था, पर आज के समाजवादी नेताओं को किस लिए जाना जाता है यह जगजाहिर है।
दरअसल, कर्पूरी ठाकुर ने जिस तरह अपने समूचे राजनीतिक जीवन को संघर्ष का पर्याय बनाए रखा, हाशिये के समुदायों की भलाई के लिए खुद को दांव पर लगाया, अपमान सहे और अपने निजी व सार्वजनिक जीवन में कतई कोई फांक नहीं रहने दी। आज की राजनीति में उसकी मिसाल दुर्लभ है।
कर्पूरी ठाकुर बिहार में दो बार मुख्यमंत्री , एक बार उपमुख्यमंत्री और दशकों तक विधायक और विरोधी दल के नेता रहे। 1952 की पहली विधानसभा में चुनाव जीतने के बाद वे बिहार विधानसभा का चुनाव कभी नहीं हारे। राजनीति का इतना लंबा सफर करने के बाद जब उनका देहांत हुआ तो अपने परिवार को विरासत में देने के लिए एक मकान तक उनके नाम नहीं था।