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Bihar: बिहार में साइबर क्राइम से भी बड़ा खतरा मानव तस्करी, डीजीपी बोले- हर जिले में बने एंटी ट्रैफिकिंग यूनिट

Thu, 30 Jul 2026 10:34 PM IST
आशुतोष प्रताप सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना

सार

विश्व मानव तस्करी विरोधी दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में बिहार के डीजीपी विनय कुमार ने कहा कि राज्य में मानव तस्करी साइबर अपराध से भी बड़ा खतरा बन चुकी है और इसके मामले साइबर क्राइम से तीन गुना अधिक दर्ज हो रहे हैं।
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बिहार में मानव तस्करी पर डीजीपी का बड़ा अलर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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विश्व मानव तस्करी विरोधी दिवस (30 जुलाई) के अवसर पर पुलिस मुख्यालय के सरदार पटेल भवन स्थित सभागार में विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम का विषय 'ट्रैप्ड बिहाइंड द स्कैम' रखा गया था। इसका आयोजन पुलिस मुख्यालय के अंतर्गत एसआईडी की कमजोर वर्ग इकाई की ओर से किया गया। इस दौरान डीजीपी विनय कुमार ने कहा कि बिहार में मानव तस्करी तेजी से बढ़ता अपराध बन चुका है और इसके मामले साइबर अपराध से तीन गुना अधिक दर्ज हो रहे हैं। ऐसे में इसे रोकने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है।

हर महिला थाने में बने एंटी ट्रैफिकिंग यूनिट

डीजीपी ने कमजोर वर्ग इकाई को इस संबंध में प्रस्ताव तैयार कर भेजने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि राज्य के सभी जिलों के महिला थानों में कम से कम दो विशेष इकाइयों का गठन किया जाए।

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पहली इकाई मानव तस्करी से जुड़े मामलों की जांच करेगी, जबकि दूसरी इकाई महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों की निगरानी करेगी। दोनों इकाइयों का नेतृत्व इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी करें, जबकि महिला थाने की कमान डीएसपी रैंक के अधिकारी के हाथ में होनी चाहिए।

'मानव तस्करी एक साइलेंट क्राइम है'

डीजीपी ने कहा कि मानव तस्करी ऐसा अपराध है, जिसके घाव और असर तुरंत दिखाई नहीं देते, लेकिन इसका दर्द पीड़ित और उसके परिवार को लंबे समय तक झेलना पड़ता है। इसलिए इसे 'साइलेंट क्राइम' की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि बिहार देश का पहला राज्य है, जहां सभी जिलों में ऐसे मामलों की निगरानी के लिए डीएसपी (स्पेशल क्राइम) का पद सृजित किया गया है और इन पदों पर अधिकारियों की तैनाती भी की गई है। हालांकि मौजूदा व्यवस्था अब पर्याप्त नहीं है, क्योंकि मानव तस्करी के तरीके लगातार बदल रहे हैं और पीड़ितों की संख्या बढ़ती जा रही है। डीजीपी ने निर्देश दिया कि यदि कोई बच्चा तीन महीने तक लापता रहता है और उसका पता नहीं चलता, तो ऐसे मामलों को एंटी ट्रैफिकिंग यूनिट को सौंप दिया जाए ताकि विशेष स्तर पर जांच हो सके।

पांच साल में गुमशुदगी के मामलों में तीन गुना बढ़ोतरी

डीजीपी ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में गुमशुदा बच्चों के मामलों को सामान्य अपहरण की श्रेणी में दर्ज कर जांच शुरू की गई है। इसके बाद ऐसे मामलों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज हुई है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2020 में सामान्य अपहरण के करीब 8 हजार मामले दर्ज हुए थे, जबकि वर्ष 2025 में यह संख्या बढ़कर 24 हजार से अधिक हो गई। यानी पांच वर्षों में ऐसे मामलों में तीन से चार गुना वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि गुमशुदा बच्चों की बरामदगी दर लगभग 70 प्रतिशत है, लेकिन मानव तस्करी के शिकार बच्चों और महिलाओं की रिकवरी दर अभी भी काफी कम है, जो चिंता का विषय है।

'वात्सल्य पोर्टल' पर अपलोड होगी पूरी जानकारी

डीजीपी ने बताया कि अब मानव तस्करी और गुमशुदा बच्चों से जुड़े सभी मामलों की जानकारी केंद्रीय गृह मंत्रालय के 'वात्सल्य पोर्टल' पर अपलोड करना अनिवार्य कर दिया गया है। उन्होंने सभी पुलिस अधिकारियों से कहा कि बच्चों और महिलाओं की गुमशुदगी तथा अपहरण के मामलों को सर्वोच्च प्राथमिकता देकर संवेदनशीलता के साथ जांच करनी होगी।

तस्करों को सजा दिलाना सबसे बड़ी प्राथमिकता

डीजीपी ने कहा कि केवल एफआईआर दर्ज कर लेना पर्याप्त नहीं है। ऐसे मामलों में आरोपियों को अदालत से सजा दिलाना सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि गवाही के समय अदालत में प्राथमिकता के आधार पर उपस्थित हों। यदि लगातार 10 से 15 मामलों में तस्करों को सजा मिलती है तो इस अपराध पर काफी हद तक रोक लगाई जा सकती है। उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों को भी इन मामलों की नियमित निगरानी करने और दोषियों को सजा दिलाने पर विशेष ध्यान देने का निर्देश दिया।

1200 थाने 'वात्सल्य पोर्टल' से जुड़े

कार्यक्रम में एडीजी (कमजोर वर्ग) कासे एस. अनुपम ने स्वागत भाषण देते हुए बताया कि राज्य के 1200 थानों को वात्सल्य पोर्टल से जोड़ दिया गया है। उन्होंने कहा कि सभी थानों के लिए गुमशुदा बच्चों की जानकारी तुरंत पोर्टल पर अपलोड करना अनिवार्य किया गया है, जिससे बच्चों की तलाश आसान होगी। अब तक 10 हजार से अधिक बच्चों का रिकॉर्ड पोर्टल पर दर्ज किया जा चुका है।

'नया सवेरा 3.0' अभियान में मिली बड़ी सफलता

एडीजी ने बताया कि हाल में चलाए गए अभियान के दौरान समस्तीपुर, मोतिहारी समेत कई जिलों से बड़ी संख्या में बच्चों और महिलाओं को मानव तस्करी के चंगुल से मुक्त कराया गया। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन नया सवेरा 3.0 के तहत अब तक 88 मानव तस्करों को सजा दिलाई जा चुकी है। उन्होंने यह भी बताया कि इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस की झांकी में पुलिस अभ्या ब्रिगेड को भी स्थान दिया गया है।

श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले जिलों और अधिकारियों को सम्मान

कार्यक्रम के दौरान डीजीपी ने ऑपरेशन नया सवेरा 3.0 और मानव तस्करी के खिलाफ उत्कृष्ट कार्य करने वाले जिलों को सम्मानित किया। संबंधित जिलों के पुलिस अधीक्षकों की ओर से वहां के डीएसपी (स्पेशल क्राइम) ने पुरस्कार ग्रहण किए।

सम्मानित जिले

  • तस्करों की गिरफ्तारी में पटना पहले स्थान पर रहा, जहां 56 तस्करों को गिरफ्तार किया गया।

  • सहरसा दूसरे स्थान पर रहा।

  • नाबालिगों और महिलाओं की बरामदगी में किशनगंज पहले और सीतामढ़ी दूसरे स्थान पर रहा।

34 दिनों में दो तस्करों को सजा दिलाने वाली टीम को विशेष सम्मान

बगहा में मात्र 34 दिनों के भीतर दो मानव तस्करों को अदालत से सजा दिलाने के लिए न्यायाधीश मानवेंद्र कुमार मिश्रा, एसडीपीओ कुमार दयेंद्र और एपीपी जितेंद्र कुमार भारती को विशेष रूप से सम्मानित किया गया।

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कार्यक्रम में एडीजी (सीआईडी) पारसनाथ, डीआईजी (कमजोर वर्ग) आमिर जावेद सहित पुलिस विभाग के कई वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे।

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