मुजफ्फरपुर में हजरत अली की शहादत की याद में सोमवार देर रात मातमी मजलिस और जुलूस का आयोजन किया गया। हाजी आशिक हुसैन वक्फ इमामबाड़ा, नई बाज़ार से ‘साहब-ए-गलीम’ का ताबूत निकालकर मातमी जुलूस निकाला गया, जिसमें बड़ी संख्या में शिया और सुन्नी समुदाय के लोग शामिल हुए। जुलूस शहर के विभिन्न मार्गों से गुजरते हुए नगर थाना क्षेत्र के कमरा मोहल्ला स्थित रौजाए अमीरिलमोमेनीन पहुंचकर समाप्त हुआ।
मजलिस में हजरत अली की शहादत को किया गया याद
इस मौके पर आयोजित मजलिस को मौलाना वेकार अहमद रिज़वी ने संबोधित किया। उन्होंने कहा कि आखिरी हज से पहले पैगंबर मोहम्मद साहब ने हजरत अली को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। उन्होंने बताया कि हजरत अली ने इस्लाम की रक्षा के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया और इस्लाम की कई लड़ाइयों में लश्कर-ए-इस्लाम के कमांडर रहे।
21 रमजान को हुई थी शहादत
मौलाना ने बताया कि 19 रमज़ान 40 हिजरी को इब्ने मुलजिम नामक व्यक्ति ने साजिश के तहत फज्र की नमाज के दौरान जहरीली तलवार से हजरत अली के सिर पर वार किया था। इस हमले के दो दिन बाद 21 रमजान 40 हिजरी को उनकी शहादत हुई थी। इसी की याद में हर साल मातमी जुलूस और मजलिस आयोजित की जाती है।
मातमी अंजुमनों ने किया नौहा और मातम
जुलूस के दौरान अंजुमने जाफरिया कमरा चंदवारा, अंजुमने हाशिमिया रजिस्टर्ड हसनचक बंगरा और अंजुमने कारवाने केसा ब्रह्मपुरा के सदस्यों ने नौहा पढ़ते हुए मातम किया। इस दौरान “अली मौला, हैदर मौला” के नारे भी लगाए गए।
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अयातुल्लाह खामनैई की तस्वीरें भी बांटी गईं
कार्यक्रम के दौरान ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामनैई को भी याद किया गया। मजलिस में शामिल उलेमा और मातमी अंजुमनों के जिम्मेदारों को उनकी तैलीय तस्वीर बतौर यादगार भेंट की गई।