फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मांझी और लालू के बदलते तेवरों ने उलझाई बिहार की राजनीति

विज्ञापन
विज्ञापन
दिल्ली के बाद इस समय देशभर में सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोर रही है बिहार की राजनीति। वहां चुनाव बेशक पांच-छह महीने शेष हैं लेकिन राजनीति के रंग पल पल बदल रहे हैं। बिहार की राजनीति एक ऐसी सांप सीढी की तरह हो चुकी है जिसका हर किरदार किसी को कभी भी डस ले।
विज्ञापन


बिहार के चाणक्य माने जाने वाले लालू यादव मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ गलबहियां करके दोस्ती और दुश्मनी दोनों निभाने में लगे हैं तो पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी भी खुद को किंग मेकर साबित करने में कसर नहीं छोड़ना चाहते।

राजनीतिक पंडित भी मानते हैं कि आगामी चुनाव में इन दोनों नेताओं की भूमिका खास रहने वाली है, शायद यही एहसास दोनों के रोज-रोज बदलते बयानों की बड़ी वजह भी है। दोनों में से कोई भी खुलकर अपना रुख स्पष्ट नहीं कर रहा है।
विज्ञापन


लालू जहां जनता परिवार का सदस्य बनने के बाद भी अपनी शर्तों को लेकर अड़े हुए हैं, वहीं मांझी कभी मोदी के गले मिलकर आते हैं तो कभी लालू को माला पहनाने के लिए तैयार रहते हैं। लालू और मांझी एक दूसरे पर डोरे डालने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे।
विज्ञापन

चुनाव से पहले ही मुश्किल में फंसे नीतीश कुमार

एक ही गठबंधन में होने के बावजूद लालू किसी भी हाल में नीतीश को मुख्यमंत्री पद देने को तैयार नहीं हैं, तो मांझी भी नीतीश से समर्थन वापिस लेने की शर्त में भाजपा का हाथ झटककर लालू से हाथ मिलाने को तैयार बैठे हैं।

इसमें सबसे ज्यादा नुकसान की स्थिति में हैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनके सिपहसिलार शरद यादव। भाजपा के विरोध में अपने धुर विरोधी लालू से भी हाथ मिला चुके नीतीश की मुसीबत ये है कि भाजपा के साथ खाईयां इतनी गहरी हो चुकी हैं कि उन्हें भरना संभव नहीं है, लालू यादव गठबंधन में उन्हें मुख्यमंत्री पद देना नहीं चाहते तो मांझी इसी शर्त पर लालू को समर्थन देने को तैयार बैठे हैं।

अब न नीतीश लालू से गठबंधन तोड़ सकते हैं न ही मांझी को साथ जोड़ सकते हैं। ऐसे में बिहार के समर में अकेले लड़ने का साहस वो शायद ही दिखा पाएं।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें