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बिहार में सीधी लड़ाई लड़ना बीजेपी की सबसे बड़ी भूल

Sun, 08 Nov 2015 09:45 PM IST
सुदीप श्रीवास्तव/ राजनीतिक विश्लेषक, अमर उजाला डॉट कॉम के लिए
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बिहार चुनाव के नतीजे जिस एक बात को पूरी तरह से साबित करते हैं वो ये है कि जिस भी राज्य में अल्पसंख्यकों की आबादी ठीक ठाक है, वहां मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी एक त्रिकोणीय और बुहकोणीय चुनाव की पार्टी है।
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हरियाणा और महाराष्ट्र की सफलता मोदी बुखार से ज्यादा त्रिकोणीय और चतुष्कोणीय चुनाव का नतीजा है। इस साल दिल्ली के चुनाव में वोटर्स ने इस भेद को पकड़ लिया था जिसे आज तक राजनीतिक पंडित स्वीकारना नहीं चाहते।

दिल्ली में मतदाताओं ने एक त्रिकोणीय लड़ाई को सीधी लड़ाई बनाया इसके बावजूद बिहार में सीधी लड़ाई लड़ना बीजेपी की सबसे बड़ी भूल रही।

राजनीतिक रूप से सर्वाधिक चैतन्य राज्य बिहार में ओवैसी, मुलायम, पप्पू का का एक नकली तीसरा मोर्चा बना कर यह सोचना कि वो बड़ा वोटकटवा साबित होगा, राजनीतिक मूर्खता की पराकाष्ठा है।
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अमित शाह को उत्तर प्रदेश के लोकसभा चुनाव से मिली बड़ी सफलता ने अध्यक्ष बनवा दिया और उन्होंने बिहारी नेताओं को किनारे कर पूरी कमान संभाल ली। इस सबके बीच किसी ने यह ध्यान नहीं दिया कि यूपी और बिहार में बुनियादी अंतर क्या हैं?

संघ के लगातर काम से भाजपा की पैठ उच्च जातियों के बाद ओबीसी जातियों में तेजी से बढ़ी हैं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य इसका उदाहरण हैं। इसके विपरीत दलित मतदाताओं में भाजपा की पैठ उतनी नहीं है।

यूपी में यादवों के आलावा ओबीसी जातियों का कोई नेता नहीं है जबकि बिहार में नीतीश इसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। यूपी में दलित मतदाता मायावती के पास जाते हैं लेकिन बिहार में लोजपा और 'हम' दोनों को अपने साथ जोड़कर बना एक विरोधाभासी गठबंधन भाजपा के लिए काम नहीं आया।

एक और राजनीतिक भूल

भाजपा का मुख्यमंत्री न घोषित करना और मोदी, शाह के चेहरे पर चुनाव लड़ना भी एक रणनीतिक भूल रही। सुशील मोदी, मुख्यमंत्री बनेंगे यह बात सारे बड़े नेता जानते थे और इस कारण जो भी भीतरघात होना होगा, वो हुआ ही होगा।

कम से कम अगर 8 साल उपमुख्यमंत्री रहे सुशील मोदी को मुख्यमंत्री घोषित कर दिया होता तो बिहार चुनाव का एजेंडा विकास तक ही सीमित रहता और एक 'विनम्र अभियान- एक मौका बीजेपी को' मतदाताओं को ज्यादा अपील करता।

जंगल राज या भ्रष्टाचार इस देश के लिए सांप्रदायिक सद्भाव के सामने बड़ा मुद्दा नहीं है यह समझने में मोदी पूरी तरह से असफल रहे। जिन मुद्दों के आधार पर ओबीसी के एक बड़े वर्ग ने लालू का साथ छोड़ा था उनमें बड़ी संख्या मोदी या शाह की सांप्रदायिक राजनीति को भी नकारते हैं।

नीतीश और लालू गठबंधन की तुलना मैंने कुछ दिन पहले एक ट्वीट में की थी और कहा था कि यह टीम 90 की अटल आडवाणी टीम की तरह है जिसमें सारी संगठन क्षमता और कट्टर बातें आडवाणी कहते थे और अटल एक सौम्य चेहरा बनकर बाकियों को लुभाते रहे। इस टीम को कोई जवाब भाजपा के पास नहीं था।

कल ही मैंने लालू को इस चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति और राजद के 70 सीट की भविष्यवाणी की थी और आज नतीजों से यह साबित भी हो गया। लोजपा और 'हम' के साथ होने के बावजूद दलितों ने भाजपा का साथ नहीं दिया इसका कारण भी बहुत साफ है।

एक तो लोजपा और 'हम' के साथ आने में ही दलित और महादलित का विरोधाभास है, वहीं बिहार में इस वर्ग में भाजपा की पैठ कभी नहीं रही। दोनों ही दलों का वोटबैंक मूलरूप से सेक्यूलर है, जबकि भाजपा ने बिहार में ध्रुवीकरण की राजनीति पर भरोसा किया। लोजपा और हम के वोटर ध्रुवीकरण की राजन‌ीति से कभी प्रभावित नहीं रहे। ऐसे में वीके सिंह और हरियाणा के की घटना ने बची कुछी संभावना पर पानी फेर दिया।
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आडवाणी को जन्मदिन का तोहफा?

अब रही बात अपर कास्ट की जिसे भाजपा ने अपना बंधुआ मजदूर मान रखा है, इसमें ऐसे लोगों की भी बड़ी संख्या है जिन्हें भाजपा 'धर्म निरपेक्ष और उदारवादी' होने की गाली देती है।

जिन उदारवादी लोगों ने 2014 में मोदी को विकास की आशा मानकर वोट किया था उन्हें अपना असली परिचय देने के लिए भी केवल मोदी जिम्मेदार हैं। हालांकि कांग्रेस एक जूनियर पार्टनर थी पर उसके द्वारा पिछले एक साल से मोदी के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान का बड़ा लाभ महागठबंधन को हुआ है।

भूमि अधिग्रहण बिल या महंगाई को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा मुद्दा बना कर भाजपा और मोदी के गरीब विरोधी होने का आरोप लोगों को सही लगने लगा। रही बात 1.25 लाख करोड़ के पैकेज और 'पढ़ाई, नौकरी, दवाई' या 'बिजली,सड़क, पानी' की तो मोदी को यह समझना चाहिए था कि उनके पुराने वादे वैसे ही उनका माखौल उड़ा रहे थे। केंद्र में सत्ताधारी दल का इतना अहंकार भरा प्रचार अभियान हमेशा उल्टे नतीजे देता है।

आखिर में, आज आडवाणी जी का जन्मदिन है और शायद इससे अच्छा जन्मदिन का उपहार उन्होंने सोचा भी नहीं होगा। मोदी, शाह को शायद नतीजों की आशंका थी, इसीलिए वे सुबह-सुबह आडवाणी को जन्मदिन की बधाई देने पहुंच गए क्योंकि उन दोनों के खिलाफ भाजपा में विरोध की शुरुआत अगर होगी तो इसी घर से होगी।
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