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बिहार के दलित उड़ा सकते हैं नीतीश के होश, कैसे?

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बिहार में राजग से पार पाने के लिए दुश्मनी भुला कर राजद सुप्रीमो का दामन थामने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सत्ता हासिल करने की राह में दलित बिरादरी मुसीबत खड़ी कर सकती है।
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जदयू का समूचे दलित वोट बैंक पर कभी पूरा प्रभाव नहीं रहा है, फिर बड़ी मुश्किल से महादलितों में पार्टी का बना आधार भी पूर्व सीएम जीतनराम मांझी की नाराजगी के कारण दरकने की कगार पर है।

दूसरी ओर किसी भी कीमत पर बिहार की सत्ता हासिल करने के लिए हाथपांव मार रही भाजपा मांझी के साथ-साथ लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान के सहारे पूरे दलित वोट का राजग के पक्ष में ध्रुवीकरण कराने में जुटी है।
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मांझी की नाराजगी से महादलित वोट बैंक में बिखराव का डर

पार्टी को लगता है कि मांझी-पासवान के सहारे वह न केवल दलितों को नीतीश के खिलाफ गोलबंद कर पाएगी, बल्कि  जदयू के ताकतवर महादलित वोट बैंक में भी बड़ा सेंध लगाएगी।

उल्लेखनीय है कि नीतीश ने पार्टी के बेहद मजबूत माने जाने वाले महादलित वोट बैंक को सियासी संदेश देने के लिए लोकसभा में मिली करारी हार के बाद इसी बिरादरी के मांझी को सरकार की कमान सौंप दी थी। हालांकि, बाद में मतभेद के कारण उन्हें मांझी को मुख्यमंत्री पद से हटाना पड़ा। इस फैसले के बाद माना जा रहा है महादलित बिरादरी नीतीश से नाराज है।

राज्य में दलित बिरादरी के 16 फीसदी मतदाता करीब पांच दर्जन सीटों पर उम्मीदवारों की हार जीत तय करते आए हैं। समूची दलित बिरादरी को साथ लाने में नाकाम रहने के बाद नीतीश ने करीब नौ साल पहले दलित बिरादरी में महादलित कार्ड खेलकर इस बिरादरी के सबसे बड़े नेता रहे पासवान को करारा झटका दिया था।
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पासवान-मांझी के सहारे वोट बैंक पर कब्जे की फिराक में भाजपा

करीब आठ फीसदी महादलित मतदाताओं को लुभाने के लिए नीतीश ने महादलितों के लिए विशेष योजनाएं चला कर और विशेष सुविधाएं उपलब्ध कराने की सफल सियासी चाल चली थी।

मगर, बीच में मांझी के साथ चरम पर पहुंची सियासी खटपट के बाद इस बिरादरी में नीतीश के खिलाफ नकारात्मक संदेश गया है। दलितों को दो खेमों में बांटे जाने के बाद लगातार सियासी घाटा झेल रहे लोजपा प्रमुख पासवान दलितों को फिर से एकजुट करने में जुटे हैं।

इसके लिए उन्हें भाजपा के सहयोग और महादलितों की नीतीश से नाराजगी को भी लाभ मिल रहा है। जदयू की मुश्किल यह भी है कि उसके पास दलित बिरादरी के नेताओं में रमई राम को छोड़कर अन्य कोई कद्दावर नेता भी नहीं है।
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