बिहार में विधानसभा चुनाव में असली मुकाबला यूं तो लालू-नीतीश और नरेन्द्र मोदी जैसे बड़े चेहरों के बीच ही सिमटकर रह गया है, लेकिन कुछ नेता ऐसे भी हैं जिनका वजूद अभी भी कायम है। लेकिन मोदी और लालू-नीतीश की इस लड़ाई में उनकी चर्चा और जिक्र पूरी तरह दबकर रह गया है।
आइए निगाह डालते हैं बिहार की राजनीति के कुछ ऐसे ही सूरमाओं पर जिनके जिक्र के बिना ये लड़ाई अधूरी ही मानी जाएगी।
रमई राम
ऐसे नेताओं में सबसे पहले नाम आता है सत्ताऱूढ़ जेडीयू के बड़े दलित नेता रमई राम का। नौ बार के विधायक रमई राम दसवीं बार एक बार फिर चुनावी मैदान में हैं। बोंचहा सुरक्षित सीट से जदयू उम्मीदवार रमई राम अब तक 9 बार विधायक चुने गए हैं।
वे 1980 से लगातर इस क्षेत्र से विधायक चुने जा रहे हैं। यूं तो राम विलास पासवान को ही बिहार का सबसे बड़ा दलित नेता माना जाता है लेकिन रमई राम कि गिनती भी बड़े दलित नेताओं में होती है। उनके समर्थक तो उन्हें पासवान से भी बड़ा नेता मानते हैं, क्योंकि उनका जादू ऐसा है कि 80 के बाद से वो आज तक नहीं हारे।
कांग्रेस की आखिरी उम्मीद हैं सदानंद सिंह
सदानंद सिंह
35 साल तक बिहार में सत्ता में रही कांग्रेस के लिए सदानंद सिंह उन गिने चुने बड़े नामों में है जिनके दम पर वह अपनी उपस्थिति इस राज्य में दर्ज करा रही है। साल 1969 में राजनीति में आने वाले सदानंद सिंह 46 वर्ष के राजनीतिक सफर में कहलगांव विधानसभा सीट से आठ बार चुनाव जीतकर रिकॉर्ड बना चुके हैं।
यही नहीं साल 1969 से 1985 तक सदानंद सिंह ने लगातार पांच चुनाव जीते। साल 1985 में विवादों के चलते कांग्रेस ने उनका टिकट काटा तो वह निर्दलीय ही चुनाव मैदान में उतर गए और जीतकर पार्टी को बैकफुट पर आने पर मजबूर कर दिया।
हालांकि 1990 में पहली बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा और फिर 1995 में भी उनकी किस्मत साथ नहीं रही। हालांकि इसके बाद 2000 और फिर 2010 में हुए चुनावों में वो एक बार फिर कहलगांव से विधायक बने।
प्रेम कुमार
गया सीट से भाजपा उम्मीदवार प्रेम कुमार को इस बार बिहार में मुख्यमंत्री की रेस का भी बड़ा दावेदार माना जा रहा है। छह बार गया से विधायक रह चुके प्रेम कुमार अब सातवीं बार मैदान में हैं। अपनी मृदभाषा और ईमानदार छवि के चलते प्रेम कुमार की क्षेत्र में जबरदस्त लोकप्रियता है।
भाजपा के पिछड़े चेहरे के तौर पर प्रेम कुमार पर अगर भाजपा जीत के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए दांव लगा दे तो कोई आश्चर्य नहीं माना जा सकता। उनके समर्थक कहते हैं कि प्रेम कुमार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकासवाद के वादे और दावों पर पूरी तरह खरा उतरते हैं।
बड़े दलित नेता हैं उदय नारायण चौधरी
अब्दुल बारी सिद्दीकी
राजद नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी की गिनती क्षेत्र के कद्दावर नेताओं में होती है। राजद विधायक दल के नेता सिद्दीकी 1977 में पहली बार बहेड़ा विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए थे। इसके बाद 1992 में वे एमएलसी चुने गये। साल 1995 में एक बार फिर एमएलए बने।
इसके बाद लगातार 2000, 2005 और 2010 में विधानसभा का चुनाव जीत चुके हैं। बिहार सरकार में वर्षों तक कई विभागों के मंत्री भी रहे। सिद्दीकी विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता भी रह चुके हैं।
उदय नारायण चौधरी
बिहार विधानसभा के स्पीकर उदय नारायण चौधरी की गिनती भी बिहार के कद्दावर दलित नेता के तौर पर होती है। इमामगंज सुरक्षित सीट से विधायक उदय नारायण चौधरी की हनक का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बीते पांच चुनावों में यहां कोई उनकी सत्ता को चुनौती नहीं दे सका है।
हालांकि इस बार उन्हें टक्कर देने के लिए हम के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने उनके सामने ताल ठोंक दी है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से नजदीकियों के चलते उदय नारायण चौधरी अक्सर विरोधियों के निशाने पर भी रहते हैं लेकिन उन्हें शायद ही इस बात से कोई दिक्कत होती हो।