बावन बूटी कला का एक नमूना।
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खास तरह के एक जैसे 52 टांकों की कला
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह जिले नालंदा के एक गांव की पहचान हैं कपिल देव प्रसाद। जिला मुख्यालय बिहारशरीफ के बसवन बीघा गांव निवासी कपिल देव प्रसाद की पहचान इसलिए भी है, क्योंकि उन्होंने बाप-दादा से सीखे हुनर को लोगों में बांटकर रोजगार का एक माध्यम विकसित कर दिया। बावन बूटी मूलत: एक तरह की बुनकर कला है। सूती या तसर के कपड़े पर हाथ से एक जैसी 52 बूटियां यानि मौटिफ टांके जाने के कारण इसे बावन बूटी कहा जाता है। बूटियों में बौद्ध धर्म-संस्कृति के प्रतीक चिह्नों की बहुत बारीक कारीगरी होती है। बावन बूटी में कमल का फूल, बोधि वृक्ष, बैल, त्रिशूल, सुनहरी मछली, धर्म का पहिया, खजाना, फूलदान, पारसोल और शंख जैसे प्रतीक चिह्न ज्यादा मिलते हैं। बावन बूटी की साड़ियां सबसे ज्यादा डिमांड में रहती हैं, वैसे इस कला से पूर्व परिचित लोग बावन बूटी चादर और पर्दे भी खोजते हैं। कपिल देव प्रसाद के दादा शनिचर तांती ने इसकी शुरुआत की थी। फिर पिता हरि तांती ने सिलसिले को आगे बढ़ाया। जब 15 साल के थे, तभी इसे रोजगार के रूप में अपना लिया। अब तो बेटा ज्यादा काम संभालता है।
पद्मश्री के बाद बावन बूटी कला की पहचान बढ़ेगी
कपिलदेव प्रसाद याद करते हैं, "उस वक्त बिहार शरीफ स्थित नवरत्न महल में सरकारी बुनकर स्कूल खुला था। यह स्कूल हाफ टाइम था, जहां नियमित पढ़ाई जारी रखते हुए बच्चे बुनकरी सीखते थे। 1990 में स्कूल बंद हो गया तो बसवन बिगहा प्राथमिक बुनकर सहयोग समिति का गठन किया गया। यह समिति बेरोजगारों को प्रशिक्षण देकर उन्हें स्वरोजगार के लिए प्रेरित करती है। आत्मनिर्भर भारत अभियान से जुड़कर लोग इसका ज्यादा फायदा उठा रहे हैं। पिछले साल बावन बूटी साड़ी को जीआई टैग मिलने की प्रक्रिया शुरू होने पर इसकी चर्चा खूब हुई थी, लेकिन असल समस्या अब भी कायम है कि बड़े बाजारों में हजारों रुपए में बिकने वाली इस कारीगरी के लिए इसके कारीगरों को उचित मेहनताना नहीं मिल पाता है। मशीनी कपड़ों के बाजार में बावन बूटी की जानकारी ही कम लोगों को थी, लेकिन पद्मश्री पुरस्कार के साथ अब यह पूरे देश में खोजा जाएगा।"