चिराग पासवान ने अपनी पांच सीटें बांट दीं, महागठबंधन ने भी नहीं बुलाया तो पीएम के पास लौटे पारस।
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देर आए, दुरुस्त आए- यह वह दिखा रहे हैं, लेकिन ऐसा है नहीं। पशुपति कुमार पारस के ताजा प्रकरण पर राजनीति के जानकार दूसरी पंक्ति में प्रतिक्रिया दे रहे- हुजूर आते-आते बहुत देर कर दी। केंद्रीय मंत्री का पद छोड़कर जाने के बावजूद कई दिनों तक मौका मिला। 18 मार्च को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने सीट बंटवारा किया। 19 मार्च को पशुपति कुमार पारस ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया। 20 मार्च को उनका इस्तीफा स्वीकार कर दूसरे को जिम्मेदारी दी गई। इसके बाद भी पारस तक संदेश पहुंचाया गया कि वह भाभी रीना पासवान से मिल लें और भतीजे चिराग पासवान से गिला-शिकवा दूर कर एनडीए में लौट आएं। लेकिन, वह महागठबंधन और राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव से उम्मीद पाले बैठे रहे। शुक्रवार को जब वह उम्मीद भी धाराशायी हो गई तो लौटकर पारस घर को आए। प्रधानमंत्री के साथ तस्वीर जारी कर एनडीए के प्रति समर्पण दुहराया।
गए क्यों थे छोड़कर पशुपति पारस
'अमर उजाला' अपनी खबरों के जरिए बार-बार बता रहा था कि पशुपति कुमार पारस सच को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। शुक्रवार को 'अमर उजाला' ने बताया था कि वह अंतिम विकल्पों की ओर देख सकते हैं, क्योंकि कल तक लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने अपनी सीटें नहीं बांटी थीं। छह महीने पहले से 'अमर उजाला' ने कई बार यह सामने ला चुका है कि चुनने की बारी आएगी तो भारतीय जनता पार्टी पशुपति कुमार पारस के सामने चिराग पासवान को तवज्जो देगी। पारस भ्रम में रहे कि दिवंगत रामविलास पासवान की पार्टी के दो टुकड़े होते समय भाजपा ने उन्हें महत्व दिया तो आगे कैसे ऐसा कर सकती है! लेकिन, हुआ वही। तब चिराग पासवान और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम के प्रकरण को लेकर आमने-सामने थे। यह पारस नहीं भांप सके कि चिराग को पिछले कुछ महीनों से भाजपा तवज्जो दे रही है। चिराग के लिए भाजपा ने हाजीपुर सीट पर हरी झंडी दी तो भी पारस अड़े रहे कि लड़ेंगे तो उसी सीट से। सिर्फ एक सीट को अपनी आन-बान और शान जानकर पारस वहीं अटके रहे और चिराग पासवान के साथ बैठकर बात नहीं कर सके। सीट बंटवारे में जब भाजपा ने लोजपा के नाम पर घोषित पांचों सीटें लोजपा (रामविलास) के खाते में दे दीं तो लोजपा (राष्ट्रीय) का नाम लेकर पारस खुद ही मंत्रिमंडल से बाहर हो गए। मतलब, खुद ही कुल्हाड़ी मार ली।
अब वापसी क्यों और मिलेगा क्या?
वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्रा कहते हैं- "जिस तरह दिवंगत रामविलास पासवान को एक समय लालू प्रसाद से धोखा मिला था, उसी तरह की हालत में इस समय पशुपति कुमार पारस हैं। हर जगह से देखकर लौटे हैं, क्योंकि महागठबंधन में सीटों के बंटवारे का गणित खुली किताब है। ऐसे में पारस उस जगह नहीं टिक सके और जो उम्मीद लेकर आए थे, पूरी नहीं हुई। ऐसे में वापसी के लिए उन्होंने एक डील की है। वह डील किस्मत आधारित है।
अगर राज्यसभा सांसद विवेक ठाकुर नवादा से लोकसभा चुनाव जीत जाते हैं तो पशुपति कुमार पारस को वजह जगह मिल सकती है। मतलब, फिलहाल उन्हें अगर-मगर में लटकना है।" चाणक्या इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिकल राइट्स एंड रिसर्च के अध्यक्ष सुनील कुमार सिन्हा कहते हैं कि पारस के पास यह विकल्प नहीं होना चाहिए था, जो रुख इन्होंने आज अख्तियार किया। वह कहते हैं- "यह एक तरह से दुकानदारी है कि आप कोई सामान देख-समझ कर फिर भाव-मोल करने दूसरी जगह चले जाएं और सौदा नहीं पटा तो वापस उसी दुकानदार के पास जाकर कहें कि हम तो यहीं थे। दरअसल, जितना नुकसान उन्हें निकलने का हुआ, उससे ज्यादा नुकसान इस तरह की वापसी पर होता है। सभी को पता चल गया कि आप दरवाजे-दरवाजे घूमकर नाउम्मीद होने के बाद लौटे हैं।" कुल मिलाकर बात यहीं पर है कि लोकसभा चुनाव में पारस एनडीए में रहते हुए प्रचार कर 400 पार का प्रयास करेंगे और अपने लिए आस पाले बैठे रहेंगे।