बखरी के भगवती शक्ति पीठ की परंपरा बताई पंडित शशिकांत मिश्र ने। मिथिला में कई जगहों पर यही परंपरा।
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मिथिलांचल से बाहर प्राण आने का दिन अलग
मिथिलांचल के जागृत देवी स्थलों को दुर्गा स्थान कहा जाता है। यहां मंदिर के अंदर अष्ठी नाम से स्थान बना रहता है। जब देवी की प्रतिमा सिर के साथ इस अष्ठी पर विराजमान हो जाती हैं तो प्राणवान हो जाती हैं। इसके साथ ही पूजा शुरू हो जाती है, हालांकि परदे के अंदर कलाकार ही प्रतिमा की सजावट में लगे रहते हैं और सिर्फ पुजारी ही पूजा करते हैं। श्रीदुर्गा पूजा कल्याण समिति शिव मंदिर (चूड़ी मार्केट, पटना) के पंडित दिलीप कुमार मिश्रा कहते हैं कि "मिथिलांचल में देवी दुर्गा को भगवती कहने की ज्यादा स्थापित परंपरा है। ऐसी कई परंपराएं मिथिलांचल को अलग करती हैं। पटना या कहीं भी नवरात्र में सप्तमी के दिन पट खुलता है, उसी दिन प्राण-प्रतिष्ठा होती है। बंगाली दुर्गा पूजा स्थलों पर एक दिन पहले नवरात्र षष्ठी को देवी की प्राण-प्रतिष्ठा होती है।"