बिहार केसरी का जन्म-गृह।
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देवघर मंदिर में महादलित परिवार के व्यक्ति को बनाया था प्रमुख पुजारी
स्थानीय लोग बड़े फक्र से कहते है कि माउर गांव की यह मिट्टी आधुनिक बिहार के निर्माण के लिए एक महामानव पैदा किया था, जिन्होंने समाज सुधार के लिए देवघर के मंदिर में रूढ़िवादी पंडो के वर्चस्व को तोड़ते हुए एक महादलित परिवार के व्यक्ति को प्रमुख पुजारी बनाया था। श्रीबाबू के ज़माने में ही सिंचाई के तमाम बड़ी-बड़ी योजनाएं नहर, डैम्प, चीनी मिल का निर्माण कराया गया था जो उनके निधन के बाद ही धीरे-धीरे ध्वस्त होता चला गया। आज भी नवादा के वारसलीगंज इलाके से निकलने वाली नहर को देखकर आज का बच्चा भी उनके नाम को याद श्रद्धा से नमन करता है। बिहार के लोग राजनीतिक एवं जातिगत भावना से उठकर श्रीबाबू को इसलिए आधुनिक बिहार का निर्माता कहते है क्योंकि उनके ज़माने में जितना औद्योगीकरण औधौकिकरण हुआ था, उसका 10 से 20 प्रतिशत भी बाद के नेताओं ने नहीं करा पाया। उनके ज़माने में जिस रफ़्तार से बिहार में उद्योग लगाए जा रहे थे अगर वह रफ़्तार बरक़रार रहता तो आज बिहार के युवा दिल्ली मुंबई गुजरात की ओर पलायन नहीं करते। उनके ज़माने के खोदे गए नहर से अगर आज पानी आता तो यह के मजदूर किसान बिहार की खेती छोड़कर पंजाब और हरियाणा की ओर नहीं जाते।
जगह-जगह सभा आयोजित कर करते हैं याद
श्रीबाबू ही वह शख्स थे जिहोने बिहार की धरती को हरा भरा करने के लिए सभी स्टेट हाइवे के दोनों तरफ छायादार वृक्ष लगवाने की योजना लागू करवाएं थे ताकि प्राकृतिक संतुलन के साथ-साथ पर्यावरण की रक्षा हो सकें। कहा जाता है कि बिहार और बंगाल के बंटवारे के दौरान वह चितरंजन का रेल कारखाना छोड़कर छोटा नगरपुर का पठार लेना स्वीकार किया था उस समय उनकी आलोचना हुई थी की बना बनाया कारखाना छोड़कर जंगली इलाका को उन्होंने स्वीकार किया। लेकिन बाद में वही पठार जब माइनिंग शुरू हुआ तब बिहार के राजस्व में चार चाँद लग्न शुरू हो गया तथा लाखों लोगों को रोजगार मिला। उनकी दूरदर्शिता, सरलता, विद्वता, सर्वधर्म सद्भाव के कारण ही आज लोग उन्हें श्रद्धा से याद करते है तथा उनके जन्मदिन पर जगह-जगह सभाएं आयोजित कर उनके बताए गए मार्ग पर चलने का संकल्प लेते है।
(इनपुट: चंदन कुमार)