पुल के काम से हटाए गए बलुआही मिट्टी का टीला दिखाते हुए हबरू राय ने खोला घटिया निर्माण का सच।
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झांक रहे 8 एमएम के छड़ और उड़ रही धूल बता रही सब
अररिया के कुर्साकांटा और सिकटी के बीच इस पुल के नहीं बनने के कारण इस तरफ से उस तरफ काम या बाजार करने आने-जाने वाले लोगों को छोटी नाव का सहारा लेना पड़ता है। ऐसे लोगों में शामिल दिनेश्वर मंडल, पांडव मंडल, घनश्याम मंडल आदि ने कहा- “इस पुल का लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं और भ्रष्टाचार के कारण अब उम्मीद टूट रही। जिस समय पुल गिरा, वहां पर पानी था। लेकिन, जब यह गिरा तो पुल का सीमेंट-बालू वाला मसाला इस तरह उड़ा कि कुछ देर तक कुछ दिखना बंद हो गया।” इस बात की तसदीक ‘अमर उजाला’ टीम ने भी की। पुल का जो हिस्सा रेलिंग तक आया था, उसमें 12 एमएम और कुछ उससे ज्यादा मोटाई का छड़ दिखा, लेकिन 8 एमएम का छड़ बहुत ज्यादा नजर आया। इस मोटाई में सरिया का इस्तेमाल होना था या नहीं, यह जांच का विषय है। मलबे में दिख रहे ऐसे सरिया को हिलाने से सीमेंट और गिट्टी का टुकड़ा निकल जा रहा। उसे हाथ से कुरेदने पर सीमेंट-बालू का मसाला मिट्टी की तरह छूट रहा है। पुल के स्लैब का टुकड़ा जमीन पर पटकने से भी टूट रहा। कई तो उठाते ही टुकड़े में गिर जा रहा है। हम यह सब देख ही रहे थे कि हबरू राय पहुंच गए। हमें वीडियो और फोटो बनाते देख उन्होंने कहा- “सर, यही बकरा का बालू है। बालू कहिए कि बलुआही मिट्टी। आसपास के गांव में कोई घर इस बालू से नहीं बना होगा। इसी से पुल बनाया है। हम भी काम कर रहे थे। जब इसके लिए टोके तो हमें भगा दिया गया। काम करते रहते और पुल गिरा होता तो क्या मुंह दिखाते?” एक मजदूर अपने इलाके के खिलाफ साजिश में शामिल नहीं हुआ, लेकिन भ्रष्टाचार का यह पुल तैयार होते-होते अधोगति को प्राप्त जरूर हुआ। ऐसे में सवाल उठ सकता है कि जिस तरह बिहार सरकार के राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री दिलीप जायसवाल ने अपने विभाग में भ्रष्टाचार को स्वीकार किया है, क्या ग्रामीण कार्य विभाग के मंत्री अशोक चौधरी भी खुलकर अररिया के पुल की हालत पर सच को स्वीकार करेंगे?
(साथ में, संवाददाता
कृष्ण बल्लभ नारायण)